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‘राजपाठ’ के लिए ‘अयोध्या’ का परित्याग

Posted on: 02 May 2019 18:30 by Surbhi Bhawsar
‘राजपाठ’ के लिए ‘अयोध्या’ का परित्याग

कसम राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे का नाद करने वाले भाजपाइयों के तेवर बदले हुए हैं। जिस तरह भगवान राम ने अवधपुरी नरेश दशरथ की आज्ञा का पालन करने के लिए ‘राजपाठ’ का त्याग किया था, उसी तरह ‘राजपाठ’ की खातिर भाजपाइयों ने अयोध्या (में राम मंदिर बनाने के मुद्दे) का परित्याग राजनीतिक स्तर पर कर दिया है।

इसकी शुरुआत अटलजी के जमाने में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के गठन के साथ ही हो गई थी। तब कहा गया था हमारे पास बहुमत नहीं है, लिहाजा हम इस बारे में कुछ भी कानूनी या संवैधानिक तौर पर करने में समर्थ या सक्षम नहीं। जब देश की जनता बहुमत देगी तब अयोध्या के साथ ही कश्मीर से धारा 370  हटाने जैसे मुद्दों पर काम करेंगे।

इसके बाद भाजपा व राजग दस साल 2004 से 2014 तक सत्ता से ही दूर रहे। 2014 में सत्ता में आए तो पूर्ण बहुमत भी साथ में था, लेकिन अयोध्या से दूरी बरकरार रही। अलबत्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और संतों के विभिन्न फोरम से राम मंदिर अयोध्या में ही बनाने की बात बुलंद होती रही, लेकिन भाजपा नेताओं के लिए यह विषय महज भाषणों तक ही सीमित रहा। मैदानी तौर पर मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि अयोध्या संबंधी मामलों का जल्दी निपटारा करे और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में समझौते के लिए एक समिति बना दी।

मैदानी तौर पर भाजपा औऱ खासतौर पर नरेंद्र मोदी की अयोध्या या रामलला के मंदिर से दूरी बरकरार ही रहे। इस दौरान वे अयोध्या (पहले नाम फैजाबाद था) जिले में गए भी तो चुनावी सभाओं को संबोधित कर लौट आए। बीच में आधी से ज्यादा दुनिया नाप आए, लेकिन कभी उन्हें न तो रामलला याद आए और न ही वे वहां गए। इस बात से अयोध्यावासी जरूर मोदी से खफा हों, लेकिन गुजरात में गोधरा कांड के बाद उनकी जो कट्टर हिंदूवादी नेता की छवि बनी उसका लाभ आज तक मिल ही रहा है।

जाहिर है, इसी कार वे भी राम मंदिर मुद्दे का उपयोग महज राजनीतिक स्तर पर ही करना चाहते हैं। उनके लिए यह मसला भावनात्मक तो किसी भी स्तर पर नहीं लगता। हालिया चुनावी दौरे में भी उन्होंने इसका प्रमाण दिया। वे अयोध्या जिले के रामपुर में चुनावी सभा को संबोधित करने तो गए जो रामलला के मंदिर या अयोध्या से तीस किलोमीटर दूर है, लेकिन अयोध्या मेमं दर्शन की फुरसत उन्हें नहीं मिली। बेशक रामपुर के भाषण में उन्होंने भगवान श्रीराम और रामायण से लेकर आतंकवाद तक के मुद्दों को बयां किया। फैजाबाद (अब अयोध्या) में हुए बम धमाके भी उन्हें याद रहे, लेकिन मंदिर बनाने की कसम का जिक्र तक नहीं किया।

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