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आज विश्व कविता दिवस है ! मेरा भी जी चाह रहा है कि मैं अपनी कविता आपको सुनाऊं ।

Posted on: 22 May 2018 06:10 by Munmun Verma
आज विश्व कविता दिवस है ! मेरा भी जी चाह रहा है कि मैं अपनी कविता आपको सुनाऊं ।

मैं कवि नहीं हूं।आज तक मैंने सिर्फ एक कविता लिखी है।वह भी सिंधी भाषा में। वही कविता पोस्ट कर रहा हूं।पर कविता से पहले उसकी कहानी सुनिए !
कोई 5 बरस पहले मैं लेह लद्दाख गया था। हम सिंधियों की पूज्य नदी ‘ सिंधु ‘ लेह’ से होकर बहती है ,और उसके किनारे हर साल जून में ‘सिंधु दर्शन यात्रा उत्सव’ होता है ।मैं भी इसी उत्सव में गया था। मेरी पत्नी और बच्चे लद्दाख के एडवेंचर को लेकर उत्साहित थे और मैं खुश था कि मैं सिंधु देखने जा रहा हूं। वह सिंधु नदी जो हम सिंधीयों की सभ्यता का आधार है ,वह सिंधु जिसके बगैर सिंध की कोई कहानी पूरी नहीं होती।
…जब मैंने सिंधु को देखा तो मुझे लगा मैं खामखा जज़्बाती हो रहा था। सिंधु ,जो पाकिस्तान पहुंचकर दरिया हो जाती है यहां किसी गांव की बरसाती नदी सी कृशकाय और साधारण लग रही थी । मैंने कोशिश की, कि मैं इस सिंधु को महसूस करूं ।कोई भाव मेरे मन में जागे। पर मुझे कुछ भी महसूस नहीं हुआ। हमने नदी पूजन की औपचारिकता पूरी की। सिंधु दर्शन यात्रा उत्सव देखा। अगले तीन-चार दिनों तक हम लद्दाख घूमते रहे । मैं सिंधु की बात भूल गया।वापसी की यात्रा शुरू हुई ! मैं ड्राइव कर रहा था। जब हम लेह से लगभग 40 -50 किलोमीटर दूर निकल आए ,तब अचानक मुझे एहसास हुआ कि मैंने सिंधु को देख लिया है। मुझे एक किस्म की संपूर्णता का अनुभव हुआ । एक फुल-फिलमेंट महसूस हुआ। मेरी आंखों ने सिंधु को देखा है । उस सिंधु को जिसे मेरे दादा परदादा ने पूजा था । वह सिंधु जो उनके जीने का आधार थी।आनंद की एक लहर मेरे भीतर से उठी। मैंने अचानक पाया मेरे रोंऐं खड़े हो रहे हैं । मेरा गला रुंध रहा है । मैंने कुछ वैसा महसूस किया जैसा कोई बहुत प्रेम पाने के बाद महसूस करता होगा। मैंने बहुत सुरक्षित महसूस किया । लगा जैसे मैं अकेला नहीं हूं। मैं सिंधु को बिलांग करता हूं …। मैंने जाना कि जीने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान की तरह या उससे भी अधिक बुनियादी जरूरत है ‘सेंस ऑफ बिलांगिंग… ! कि हम किसी के हैं , कोई हमारा है ! प्रेम की तलाश में रिश्ता दर रिश्ता क्या हम यही सेंस ऑफ बिलांगिंग तलाशते हैं ? क्या यही वह चाह है जो हमसे परिवार ,समाज और देश बनवाती हैं । क्या यह सेंस आफ बिलांगिंग ही है जो कपड़े के एक रंगीन टुकड़े को एक झंडे मे बदल देती है जिसके लिए अपनी जान दी जा सकती है और किसी की जान ली भी जा सकती है ? या फिर क्या यही वह तलाश है जिसके वजह से दो किनारों के बीच बहते पानी को देवी मानकर पूजा जाता है..
कितना सुख है यह जानने में कि इस पृथ्वी पर हम अनाथ अकेले नहीं है। हम अंतरिक्ष में बगैर ओर-छोर के बेवजह भटकते अभिशप्त पिंड नहीं है… हम एक अनंत श्रंखला की कड़ी है , अपने जैसे बहुत से लोगों के साथ एक डोर में बंधे हुए… ।
मेरे लिए सिंधु वह डोर थी ।
मैंने कार साइड में लगाई ।अपने बेटे को स्टीयरींग थमाया और पीछे की सीट पर बैठ कर जो डायरी में कुछ लिखा। यह वही कविता है ।शायद कविता के व्याकरण की दृष्टि से इसमें बहुत सी गलतियां हैं ।पर मैंने इसे एडिट नहीं किया । मुझे डर है कि इसे ठीक करूंगा तो मैं इसकी सच्चाई को गंवा दूंगा । मेरी टूटी फूटी कविता जो अनुवाद में और भी टूट फूट गई है, आपको पढ़वाता हूं ।

सिंंधु मेरी मां !

मेरेे पिता ने मुझे बताया था / कि रहती है , हमारी एक बड़ी मां /दूर पहाड़ों के पार /
जिसकी गोद में बसे और बढ़े पुरखे हमारे… /और यह भी कहा था / कि अगर तुम्हें लगे कभी ,कि थक गए हो तुम जिंदगी से लड़ते-लड़ते / और पाओ खुद को अकेला इस दुनिया में /तो जाना मां के पास /
पहले तो वे नाराज होंगी तुमसे / कि भुला बैठे हो तुम सब अपनी बूढ़ी मां को /
पर तुम बस गले लग जाना उनके / वे फिर भिगो देंगी तुम्हे प्यार और ममता की लहरों से / और बह जाएगा सारा विषाद और क्लेश मन का …/
आज जब मैं मां से मिला तो याद आईं मुझे /अपने गुजरे पिता की बातें/
मुझे लगा कि मैं मिल रहा हूं अपने पिता से /उनके पिता से /और अपने सभी पूर्वजों से/
लगा कि नहीं हूं मैं अकेला इस दुनिया में /मेरे साथ हैं पुरखे मेरे /और मां , तुम हो वह डोर जो हम सब को जोड़ती है /
ओ मां मेरी / तुमसे मिलकर राहत मिली है /कि तुम रहोगी यहीं /मेरे बच्चों के भी साथ /जब मैं नहीं रहूंगा इस धरती पर/ और अगर वे खुद को महसूस करेंगे अकेला /तो वे आएंगे जरूर तुम्हारे पास/ क्योंकि मैं उन्हें बता जाऊंगा /कि रहती है हमारी एक माँ/ दूर पहाड़ों के पार /
जैसे कि बता गए थे मेरे पिता मुझे ….       संजय वर्मा

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