शशिकांत गुप्ते का एक जोरदार व्यंग

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मेरे मित्र राधेश्यामजी आज कुछ अलग ही मानसिकता में थे।मिलते ही कहने लगे आप व्यंग्यकार हो। मैने आश्चर्य से उनकी ओर देखा। आप तो यूँ पूछ रहे हो जैसे आप मुझसे पहली बार ही मिल रहे हैं।
राधेश्यामजी कहने लगे चौकियों मत मेरा आशय यह है। आज मैं आपको एक मुद्दा बताता हूँ उस पर आप व्यंग्य लिखों। मुद्दा शहद से जुड़ा है। मैने कहा मधुमखियों के छत्ते को छूना जोख़िम का काम है।
राधेश्यामजी ने कहा आप तो सीधे छत्ते तक पहुँच गए मैं सिर्फ मधु की बात कर रहा हूँ।

मैने कहा पहेलियां मत बुझाओ सीधे सीधे बताओ। मुद्दा बताने जगह वह मुझसे पूछने लगे मधु को अंग्रेजी में क्या कहते हैं? मेरे मुह से सहज ही निकल गया “हनी”।

इनदिनों हनी बहुत सुर्खियों में है। मैने कहा यह मुद्दा नहीं विषय है।विषय भी “काम”(वासना) का। यह मेरे काम का नहीं है। मैं इस पर व्यंग्य नही लिख सकता।यह शुद्ध तिज़ारत हैं।आपसी लेन देन का मामला है।इस तरह के सौदों में डिमांड की पूर्ति करने के लिए सप्लाय का ध्यान रखना तो व्यावहारिकता है।यह स्वाभाविक घटने वाली मानवीय घटना है।ऐसा होता है, होता आया है,और होता रहेगा।
इसपर व्यंग्य लिखना उचित नहीं है।

मेरी बात सुनकर राधेश्यामजी नाराज हो गए। कहने लगे आप ही कहते हो व्यंग्य तो समाज सुधार की सशक्त विधा है। मैने कहा आप सच कह रहे हैं।व्यंग्यकार सामाजिक रूढ़ि, कुरीतियों, पाखंड, अंधश्रद्धा, ऐसे अनेक विषयों पर व्यंग्यात्मक लेखन करते हैं।आपने जो मुद्दा दिया है वह आपसी सामंजस्यता का मुद्दा है,और मुद्दे की बात तो यह है कि,अभी तो यह मामला उजागर हुआ है। जो शासकीय आमला इस प्रकरण पर जांच पड़ताल कर रहा है। वह जब तक जांच पूरी नही करता और कोई ठोस नतीजा सामने प्रकट नही होता तब तक इस विषय पर इस लिखना और वह भी व्यंग्य जल्दबाजी होगी।

राधेश्यामजी अपनी बात पर कायम रहते हुए कहने लगे।आप मेरे आशय को समझ ही नही पाए हो। मैने कहा समझाइए।
राधेश्यामजी ने अपना आशय समझाते हुए कहा। यह जो कुछ हुआ यह साधारण लोगों ने नही किया है।रसूखदारों ने किया है। मैने कहा साधारण लोगों की ओकात ही नही है ऐसा कुछ करने की।

राधेश्यामजी ने कहा आप बीच बीच व्यंग्य मत करो मेरी पूरी बात सुन लो। इस प्रकरण में जितने भी लोग हैं उनमे जनप्रतिनिधि भी है। बड़े बड़े ओहदों पर विराजमान प्रतिष्ठित भी हैं। मैंने कहा तुलसीबाबा लिख गए हैं “समरथ नहीं दोष गोसाईं” राधेश्यामजी झल्ला कर बोले तुलसीबाब ने यह भी लिखा है।”काम क्रोध मद लोभ सब, नाथ नरक के पंथ”

मैने भी अपना ज्ञान झाड़ने में कोई कमी नहीं की। कहा आप भूल रहे हैं राधेश्यामजी यह कलयुग है। “रामचन्द्र कहे गए सिया से ऐसा कल युग आएगा, हंस चुगेगा दाना तिनका, कौवा मोती खाएगा” यह अंतहीन विषय है। ऐसे प्रकरणो की जांच का अंतिम नतीजा जैसा हमेशा होता है, होता आया है,वैसा ही होगा जिसकी पूर्ण संभावना है।तमाम दलिलो को सुनने के बाद ठोस सबूतों के अभाव के कारण सभी को बाईज्जत बरी किया जाता है।

राधेश्यामजी ने मुझे करबद्ध प्रणाम करते हुए कहा आपका बाईज्जत कहना मुझे बहुत अच्छा लगा। मैं यही सुनना चाहता था।

शशिकान्त गुप्ते

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