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लघुता में एक महामानव : बालकवि बैरागी

Posted on: 30 May 2018 09:16 by Ravindra Singh Rana
लघुता में एक महामानव : बालकवि बैरागी

हैं करोड़ों सूर्य लेकिन सूर्य हैं बस नाम के,
जो न दें सबको उजाला, सूर्य वे किसे काम के!’

कविवर बालकवि बैरागी निरंतर गूंज रहे हैं। गूंज रहा है लघुता में एक महामानव। उस विराट की अनुगूंज सुनाई दे रही हैं। अनुगूंज उनकी गगनचुंबी कविताओं की, उनकी लोकप्रियता की, बिन मांगे की तालियों की, हिंदी के प्रबलतम समर्थन की। अनुगूंज यारानापूर्ण यायावरी की, आवारा फक्कड़पन की, दूसरों को परास्त करने वाली हंसी की, बुक्काफाड़ ठहाकों की, भावनाजन्य निर्भीकता की, विदेशी शत्रु के प्रति हुंकार की, देशी के प्रति प्यार की। अनुगूंज की भी अनुगूंजे सुनाई दे रही हैं, लगभग छ: दशक के सान्निध्य की स्मृतियों की अनुगूंजें।

मेरे पिता श्री राधेश्याम प्रगल्भ को वे अपना बड़ा भाई मानते थे। वे हमारे घर आते थे। हम जिन-जिन शहरों में रहे, वे घर आए, खुर्जा, हाथरस, मथुरा और दिल्ली, कोई भी शहर रहा हो। वे कहीं भी रहे हम उनके घर गए– मनासा, नीमच, भोपाल और दिल्ली। दरअसल, हमारे घुमंतू घरों में कवियों का आना-जाना निरंतर रहता था। बैरागी चचे, काका हाथरसी जी और मेरे पिताजी छोटी-छोटी बातों पर खूब हंसा करते थे। और, उनके हास्य का कारण चलित-प्रचलित लतीफ़े नहीं होते थे, बल्कि वे लतीफे बनाते थे, गढ़ते थे।

प्रत्युत्पन्नमतियां गतिपूर्वक संवाद करती थीं। वे जो कह देते थे, हास्य का नया प्रकार बन जाता था। कविता में तरह-तरह के वाद उन्होंने चलाए, जैसे, पर्यायवाद, वर्णविपर्ययवाद। खेलो शब्दों के साथ, नए गढ़ो। शब्दों के आगे-पीछे विशेषण-उपमान मढ़ो। वर्णों का क्रम बदल दो। शब्दों को नई अर्थवत्ता दे दो। अर्थों को नए शब्द दे दो। सिर्फ़ दो नहीं तीन-तीन चार-चार दे दो। बैरागी जी पूछते हैं मेरे पिता से, ‘कहां हो?’ पिताजी उत्तर देते हैं, ‘व्योम के, आकाश के, नीले गगन में!’ काका जी पूछते हैं, ‘वहां कौन मिलौ?’ उत्तर मिला, ‘एक विद्युत, एक बिजली, दामिनी थी।‘ बैरागी जी पुन: पूछते हैं, ‘महल के, प्रासाद के, ऊंचे भवन में कौन था?’ पिताजी कहते हैं, ‘एक महिला, एक रमणी, कामिनी थी।‘ काकाजी सराहना में छड़ी उठा लेते हैं, ‘पिटौगे दोनों!’ काकाजी मुस्कुराते हैं, शेष दो ठहाके लगाते हैं।

काकाजी मेरे पिता को ‘बेटा राधेश्याम’ कहते थे। बैरागी जी काका जी को गोद लिए हुए पिताजी कहते थे। वर्ण-विपर्यय का खेल चला तो सबके नाम बदल गए। काका हाथरसी, हाका काथरसी हो गए। राधे श्याम प्रगल्भ, प्रादेशाम रगल्भ हो गए। बाल कवि बैरागी, काल बबी गैराबी हो गए। फिर मिलते तो परस्पर इन्हीं नामों से सम्बोधित भी करते। हां, काथरसी जी! सुना रगल्भ! हां, गैराबी बोल!

यहां तक तो ठीक, कुछ भदेस प्रयोग भी कर लेते थे, उन पर तो और ज़्यादा हंसते थे। समझ की सीमा के कारण मेरे किशोर मन को पता नहीं कैसा लगता था। जैसे, लोहे के पुल को पोहे का लुल कहते थे। काकाजी विकट शब्द-शोधी थे। उन्होंने वर्ण-विपर्यय, नाम-विपर्यय, काम-विपर्यय की अनेक कविताएं रचीं। उन्नीस सौ सत्तावन में अठारह सौ सत्तावन के मुक्ति-संग्राम की शत-वार्षिकी मनाई जा रही थी। लालकिले के कविसम्मेलन में काकाजी ने वीररस में हास्य घोल दिया। ‘युद्ध-भूमि में मैंने मुर्दे पटक-पटक कर दे मारे। इतनी ताकत है मेरी इस टूटी हुई कलाई में, आज्ञा दें तो आग लगा दूं फौरन दियासलाई में। लालकिले का घंटाघर मेरे धक्के से टूटा है।‘ मैंने बैरागी जी को कहते हुए सुना ’लाल किले का धक्काघर, मेरे घंटे से टूटा है’। मैंने मंच के पीछे दबे-घुटे, कम आवाज़ के अथमनीय ठहाके सुने हैं।

स्मृतियों से स्मृतियां जुड़ी हैं। सन चौंसठ या पैंसठ की बात होगी, लालकिले के कविसम्मेलन के अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस में ख़बर छपी ’द कविसम्मेलन वाज़ स्टार्टेड बाई ए चाइल्ड पोएट अशोक शर्मा, अनदर चाइल्ड पोएट बैरागी ऑल्सो रिसाइटेड हिज़ पोयम्स’। मैं तो बालकवि था ही, बैरागी जी मुझसे दो दिन कम बीस साल बड़े थे, उनके नाम के बालकवि को भी ‘चाइल्ड पोएट’ कर दिया। अख़बार बैरागी जी ने ही मुझे दिखाया था। अब तक है मेरे पास वह कतरन।

नाम तो उनका नंदराम था। बालकवि बैरागी कैसे हुआ, डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने बताया कि तब की बात है जब बैरागी जी मुश्किल से आठ-नौ बरस के रहे होंगे। जावरा के कैलाश नाथ काटजू जी ने, जो बाद में गृहमंत्री रहे, बालक से कहा, ‘कोई कविता सुनाओ!’ बालक नंदराम ने राष्ट्र-प्रेम की ऐसी ज़बर्दस्त कविता सुनाई कि वे ही नहीं आसपास के सब लोग गदगद हो गए! काटजू बोले अबसे इस लड़के का नाम होगा बालकवि बैरागी।

बैरागी जी के बचपन में ग़रीबी गूंजती थी। अपने दिव्यांग पिता को चार छोटे-छोटे पहियों की गाड़ी पर बिठा कर वे रस्सी से खींचते थे, और टीपदार स्वर में देशभक्ति के गीत गाते थे। लोग कटोरे में सिक्के डाल देते थे। उनसे घर का ख़र्च और स्वाभिमान से उनकी पढ़ाई चलती थी। अपनी ग़रीबी का गौरवीकरण करने में उन्हें अंत तक कोई संकोच नहीं हुआ। मंगता से मिनिस्टर होने की अपनी गाथा गर्व से सुनाते थे।

जब मैं किशोर से युवा होने की दहलीज पर था तब हमने एक प्रिंटिंग प्रेस लगाई थी। कम पूंजी में बढ़िया काम करने के संकल्प के साथ उसका नाम पिताजी ने संकल्प प्रेस रख दिया था। शुरू के कुछ महीने जॉबवर्क किया। मैंने कंपोज़िंग सीखी, छोटे भाई ने मशीन से काग़ज़ उठाना। हमने जो पहली किताब प्रकाशित की, वह थी बालकवि बैरागी जी की ‘दादी का कर्ज़’! अभी मैं जब समाचारपत्रों में उनकी प्रकाशित पुस्तकों की सूची पढ़ रहा था, तो हैरान रह गया। ‘दादी का कर्ज़’ कहां गई? वह पुस्तक तो मैंने ख़ुद कम्पोज़ की थी! उसका कवर दुरंगी था। मथुरा के एक कलाकार ने बनाया था। दो ब्लॉक बने थे। लाल और आसमानी रंग में दो बार छपाई हुई थी। एक चित्ताकर्षक पुस्तक लेकर मैं प्रकाशक और सप्लायर के तौर पर भोपाल पहुंचा। तब वे नए-नए मंत्री बने थे। पिताजी को आशा थी कि ये किताब सरकारी ख़रीद में आ जाएगी, अब तो मंत्री बन गए हैं। ख़ैर, मैं भोपाल गया तो खूब आवभगत हुई। मिलने वालों की भीड़ को छोड़कर वे मुझे अंदर अध्ययन कक्ष में ले गए। पुस्तक देखकर बेहद प्रसन्न हुए। मुझे उन्होंने अपनी आने वाली फ़िल्म ‘रेशमा और शेरा’ का गीत उसी धुन में सुनाया, जो बाद में हमने फ़िल्म में सुना, ‘तू चंदा मैं चांदनी….’। मैं पहाड़ी पर उनके बंगले में दो दिन रुका। पेड़ों से घिरे हुए, ऊंचाई पर बने उस बंगले में चाची जी ने बड़ा स्नेह दिया। उनके बड़े पुत्र मुन्ना और छोटे गोर्की के साथ भी खूब खेले। वे दोनों मुझसे छोटे थे। बहुत अच्छा लगा। शानदार विदाई के साथ मैं मथुरा लौट आया।

कुछ दिन के बाद पिताजी के पास बैरागी जी का पत्र आया कि क्योंकि अब मैं मंत्री हो गया हूं, इसलिए सरकारी ख़रीद में अपनी किताब का प्रस्ताव नहीं रख सकता। कोई और रखेगा तो समर्थन नहीं करूंगा। आप मध्यप्रदेश में नहीं किसी और प्रांत में प्रयत्न करें। पिताजी भी घर-फूंक-तमाशा-देख संप्रदाय के थे। उन्होंने कहीं और प्रयास किया हो, मुझे याद नहीं पड़ता। वह पुस्तक उदारता से बांट दी गई। दोबारा छपी नहीं। शायद इसीलिए सूची में उस पुस्तक का नाम नहीं आया। बिना अपनी पूरी उम्र पाए काल के चक्र में समा गई। मुन्ना और गोर्की से पूछूंगा, एक प्रति तो हो शायद उनके पास।
फिर तो उनके साथ सैकड़ों कविसम्मेलन किए! उनके पोस्टकार्ड्स और अंतर्देशी पत्र मेरे पास भी आते रहे। ऊपर लिखते थे ‘मां’। सुंदर-सुंदर मोती जड़े अक्षर। हृदय से निकले अक्षर। हृदय में प्रवेश करने की क्षमता रखने वाले अक्षर।

अस्सी के आसपास मैंने एक व्यंग्य-कविता लिखी थी, ‘अपना देश तो महान है’। उसकी शुरुआत कुछ इस तरह करता था, ‘हमारे मित्र शार्दूल सिंह विक्रीड़ित, देश की दशा से बहुत पीड़ित! मैंने कहा, इन बहते पनालों को रोकिए, आंसुओं को अंदर ही सोखिए! वे बोले, भैया अशोक! इन आंसुओं को मत रोक!’ कविता लंबी थी। ये बात मैंने आपको इसलिए बताई कि पिछले पैंतीस सालों में चचे बैरागी मुझे जब भी मिलते थे दुख की नाटकीय मुद्रा बनाकर चहकते हुए कहते थे, ‘भैया अशोक! इन आंसुओं को मत रोक!’ मैं हंसकर उनके पैर छूता था। बीच में कुछ दिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, जब चची बीमार थीं और उनसे मिलने मैं ऑल इंडिया मेडीकल इंस्टीट्यूट जाता था। आदरणीया चची को कैंसर था। रोग ने हरा दिया, वे चली गईं। मैंने पहली बार चचे को रोते देखा। मेरी आंखें भी आंसुओं से भरी थीं। इस बार उन्होंने पहली और अंतिम बार दुखी स्वर में गले लगाते हुए कहा था, ‘बेटा अशोक! इन आंसुओं को मत रोक!’ हम दोनों के पास रुमाल नहीं थे।

अभी पिछले साल, सन दो हज़ार सत्रह के नवम्बर महीने की ग्यारह तारीख को उनसे उदयपुर के कविसम्मेलन में भेंट हुई थी। संवाद अपने मूल नाटकीय रूप में बहुत पहले ही आ चुका था, इस बार भी चंचलता के साथ मुखरित हुआ, ‘भैया अशोक! इन आंसुओं को मत रोक!’ आवाज़ में वही खनक, सम्मोहन और प्रेम का जादू। हालांकि चची के गोलोक-गमन के बाद से उन्होंने गाना छोड़ दिया था, पर स्वर में नाटकीयता की चुम्बक थी। घुटने के दर्द के कारण बैठकर, लेकिन घंटे भर कविताएं सुनाईं। वाणी की ऊर्जा में कोई कमी नहीं थी। उनकी कविताएं, हमेशा लगेगा जैसे आज भी खड़ी हैं समय के श्रोताओं के सामने! इस इंटरनेट के जमाने में भी डाक विभाग का भला करते रहे अंत तक। खादी परिधान और खादी के झोले में खूब सारे पोस्टकार्ड रखते थे।

कवि सम्मेलन जब मध्य-रात्रि के बाद समाप्त हुआ तो कवियों के चाहक बहुत सारे श्रोता मंच पर चढ़ आए। मंच का मौसम अचानक सैल्फ़िआना हो गया। हर कोई हर कवि के साथ अलग-अलग सेल्फी खींचना चाहता था। मैं घिरा हुआ था। सम्मान्य बैरागी जी भी। मुझे लगा कि कहीं भीड़ के धक्के में वे गिर न जाएं। मैं अपने चाहकों को छोड़कर उनकी और बढ़ा और सबसे कहा, ‘रुको, रुको, रुको! हम दोनों के साथ आप सबकी फोटो हो जाए। यह चित्र मेरे लिए भी ऐतिहासिक महत्व का होगा। चलो बैठो!’ कुर्सी पर बैरागी जी को बिठाया। मैं उनके चरणों में बैठ गया। सबसे कहा कि आप सब बैठें या पीछे खड़े हो जाएं। बैरागी चचे ने भी राहत की सांस ली। संयुक्त फोटो खिंचवाया। उसके बाद जब श्रोता मोबाइलों में हमें क़ैद करके चले गए तो मैंने अपना मोबाइल एक आयोजक को थमाया कि चलो चचे के साथ मेरा भी एक फोटो खींचो। चचे ने मेरा हाथ जबरन अपने कंधे पर रख लिया। मैंने आज तक ऐसा नहीं किया था कि अपने किसी वरिष्ठ के कंधे पर अपना हाथ रखा हो। एक बार मैंने देखा था कि आदित्य जी ने उनके कंधे पर हाथ रखा, दोनों सहज थे। आदित्य जी थोड़े छोटे थे लेकिन मंच पर एक साथ आए थे। यानी उनका हाथ रखना बनता था, पर मेरा तो नहीं। उन्होंने आज्ञापूर्वक कहा, ‘रखो, रखो! तुम्हारे पास ज़्यादा उम्र है, मेरे पास उम्र तुमसे कम है, तुम उम्र में मुझसे बड़े हो! हाथ रखो!

–‘मैं कभी बड़ा नहीं हो सकता चचे! बचपन से आपका जो प्यार पाया है, मेरी धरोहर है।’ जिन्होंने जीवन में निरंतर मेरा कंधा थपथपाया हो, उनके कंधे पर हाथ कैसे रख दूं भला! मैंने उनके कंधे पर हाथ नहीं रखा, बस उन्हें अपनी ओर खींच लिया।

–भैया अशोक! इन आंसुओं को रोक! मुस्काता हुआ छायाचित्र हो। मुझे भी भेजना।

अब फ़ोटो कहां भेजूं? सकर्मक चेतना और क्षमताओं के बावजूद कितनी सहजता से वे चले गए। किसी कार्यक्रम से घर लौटे थे। परिवार के साथ गप-गोष्ठी की। भोजन किया और सो गए। देर तक नहीं उठे तो पुत्र ने जगाने की कोशिश की। उनकी लाडली पौत्री रौनक ने भी उन्हें हिलाया, लेकिन वे तो जा चुके थे मेरी चची को गाकर गीत सुनाने।

वे चले गए। धरती पर उनके अपार आत्मीयों के आसपास उनके असंख्य संस्मरण गूंज रहे होंगे। हिंदी भवन में एक श्रद्धांजलि सभा हुई। प्रारंभ में ही संचालक चिराग जैन ने उसी दिन लिखी अपनी एक कविता सुनाई–

शब्दों को ईंधन करने का
जीवट ठण्डा होता है क्या?
ज्वाला में दहकर भी कंचन
अपनी आभा खोता है क्या?
यम के आदेशों से डरकर
कब कीर्तियान रुक पाते हैं,
कुछ श्वासों के थम जाने से
क्या झंझावात चुक जाते हैं?
मिट्टी को भस्म बना देना
बस यही चिता कर पाती है,
अक्षुण्ण वज्र रह जाता है
औ’ स्वयं चिता मर जाती है।
काया ने आंखें मूंदी हैं
चिंतन के नेत्र प्रखर ही हैं,
जिव्हा ने चुप्पी ओढ़ी है
भावों के शब्द मुखर ही हैं।
दीपक की पीर समझने को
बलिदान कई रातें करके,
जो थका नहीं क्षण भर को भी
नक्षत्रों से बातें करके।
जिसने जर्जर पीड़ाओं को
समिधा का मान दिलाया हो,
जिसने जग की तृष्णाओं को
अंजलि से अमिय पिलाया हो,
जिसने कविता में जीवन भर
अनहद का अंतर्नाद रचा,
जिसने ज्वाला की लपटों का
कविताओं में अनुवाद रचा।
जिसने आंसू की आह सुनी
जिसने करुणा का रोर सुना,
जिसने युग की पीड़ा गाई
जिसने आशा का शोर सुना,
यमदूत उसे ले जाने का
उपक्रम कैसे कर सकता है!
जिसने शब्दों में प्राण भरे
वह स्वयं कहां मर सकता है!!
करुणा में जब पग जाते हैं
फिर अक्षर ध्वस्त नहीं होते,
सूरज-वूरज होते होंगे,
बैरागी अस्त नहीं होते।

प्रायः किसी श्रद्धांजलि सभा में ऐसा नहीं देखा गया कि किसी के उद्बोधन के बाद तालियां बजें, लेकिन चिराग ने इतने ढंग से अपनी बात कही कि स्वत:स्फूर्त तालियां नहीं रुकीं। वाचिक परंपरा की कविता की यही तो ताक़त है कि हर मर्मस्पर्शी कविता पर तालियां बजती हैं। शोक की मनोभूमि पर भी हम तालियां बजा सकते हैं। चिराग ने अपने शब्दों में सजीव कर दिया बैरागी जी के व्यक्तित्व को। ‘सूरज-वूरज होते होंगे, बैरागी अस्त नहीं होते।‘

रह-रह कर गूंज रही हैं बैरागी जी की शब्द-ध्वनियां, ‘हैं करोड़ों सूर्य लेकिन सूर्य हैं बस नाम के, जो न दें सबको उजाला, सूर्य वे किसे काम के’।

अनेक नामचीन कवि थे उस श्रद्धांजलि सभा में, सर्वश्री बालस्वरूप राही, कृष्ण मित्र, डॉ. कुंअर बेचैन, संतोषानंद, महेश चंद शर्मा, बी. एल. गौड़, डॉ. हरीश नवल, डॉ. अनिल चतुर्वेदी, डॉ. रमा सिंह, नरेश शांडिल्य, अरुण जेमिनी, प्रवीण शुक्ल, महेश बेधड़क, राजेश जैन चेतन, मधु मोहिनी उपाध्याय, रसिक गुप्ता, मुमताज नसीम, शशांक प्रभाकर… और भी अनेक! माइक पर या बाहर चाय पीते-पीते सभी ने अपने-अपने संस्मरण सुनाए। अंत में डॉ. गोविंद व्यास ने सारगर्भित बातें कहीं कि बैरागी जी दिनकर जी के बाद उदात्त कविता के प्रथम पंक्ति के हस्ताक्षर थे। हिंदी के मंच पर वे पहले ऐसे कवि थे जिन्होंने कविता को परफॉर्मिंग आर्ट के बहुत निकट ला दिया था। उन्हें मालूम था कि किस माहौल में कैसी कविता सुनानी चाहिए। किस की तरफ देख कर सुनानी चाहिए। माइक से कितना पीछे हटकर बोलना चाहिए। कौन व्यक्ति नहीं सुन रहा है, इसकी उन्हें पहचान थी। कौन अच्छी तरह सुन रहा है, इसकी उनको अच्छी जानकारी थी। सही कहा गोविंद भैया ने।

हमारी वाचिक परम्परा को, गति देने वाले, मति देने वाले अचानक इति तक चले जाएंगे, ऐसा किसी ने सोचा भी नहीं था। वहां एक यति है, विराम, अर्द्धविराम के बाद भी चीज़ें चलेंगी। एक ऐसा व्यक्तित्व जो लघुत्तम में महत्तम था। वे बड़े थे, लेकिन अपने बड़प्पन को दिखाने के स्थान पर सदैव धरती से जुड़े रहते थे। नैतिक आदर्शों में चूक नहीं होती थी। एक साफ़गोई के साथ आत्मीयता के सारे अलिखित नियमों का पालन करते हुए वे लोगों के अपने हो जाते थे। बारंबारता के साथ गूंज रहा है, लघुता में एक महामानव।

अशोक चक्रधर

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