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राम मेश्राम की एक ग़ज़ल | Ghazal of Ram Meshram

Posted on: 23 Apr 2019 13:02 by rubi panchal
राम मेश्राम की एक ग़ज़ल | Ghazal of Ram Meshram

नज़र के सामने सत्कार बढ़िया
पलटकर ठीक पीछे वार बढ़िया |

वो लय-ही-लय में मारे डालती है
कथक के रक्स की तत्कार बढ़िबया |

इसे जमघट कहें, पचमेल कह लें
हमारी चल रही सरकार बढ़िया |

मैं गाहक हूँ न सौदागर तो काहे
मुझे ललचा रहा बाज़ार बढ़िया |

बयाँ कर दे दड़ेग़म वक़्त का सच
कहाँ है एक भी अख़बार बढ़िया |

बड़ी राहत मिली विश्वास-मत से
भले संसद हुई मिस्मार बढ़िया |

फ़क़त उपदेश के फ़न के धुरंधर
हमारे देश के फ़नकार बढ़िया |

मैं नंगाई का दर्शन रच रहा हूँ
सजाकर तर्क के हथियार बढ़िया |

ये भारत है कि पॉलीथिन की जन्नत
अमर कूड़े का हाहाकार बढ़िया |

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