पुनीता दरयानी की एक ग़ज़ल | Punita Daryani ‘GHAZAL’

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ख़्वाहिशें जब सरेआम बिकने लगी।।
बस तभी से ग़ज़ल हूँ मैं लिखने लगी।।

ख़्वाब की चादरें जब मेरी फट गई ।
दर्द की आबरू तब है दिखने लगी।।

मैंने घर से निकाला इन्हें जब से है।
ख़्वाहिशें मेरी दर-दर भटकने लगी।।

कत्ल कितनो की नीयत के होने लगे।
जुल्फ़ रुख़सार पर जब लटकने लगी।।

जीना मुझको नहीं ये कहा मैंनें जब।
साँसे मेरी ये सिर को पटकने लगी।।

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