महेंद्र शर्मा की एक गजल

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दु:ख ऐसे ही कूद के आया मेरी हिस्सेदारी में
दीवारे जैसे उठ आये घर की चारदीवारी में !

घरमें एक कुआँथा जिसका पानी हमसब पीतेथे
पूरा कुनबा ख़त्म हो गया नादानी ,अय्यारी में!

क्याखोया क्या,पाया हमने इसका क्या अंदाजाहो
हिस्से हिस्से घर को पाया बातों की होशियारी में!

अलग अलग दरवाजो से अब आनाजाना होता है
दबी हुई आवाजें है अब बच्चों की किलकारी में!

सूदखोरके चक्कर खाकर बापकी सांसे उखडगयी
मूलसे ज्यादा ब्याज बड़ाथा बनिए की मक्कारीमें!

बरसी में तो सब आये थे दूर- दूर से लोग यहाँ
कितने रिश्ते गाँठ बंधे थे ,माँ की एक किनारी में !

महेन्द्र शर्मा
इंदौर इंदिरा कॉलेज
11/4/2014

अय्यारी = धूर्तता , मक्कारी, होश्यारी

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