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संजय बारू की विवादास्पद किताब पर आधारित फिल्म एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर प्रभावी रही

Posted on: 11 Jan 2019 11:44 by Ravindra Singh Rana
संजय बारू की विवादास्पद किताब पर आधारित फिल्म एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर प्रभावी रही

अर्जुन राठौर

संजय बारू की विवादास्पद पुस्तक द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर पर केंद्रित फिल्म बहुत प्रभावी रही आज 9:15 बजे इसका प्रदर्शन प्रारंभ हुआ। फिल्म का पहला शो देखने के बाद यही कहा जा सकता है कि यूपीए के 10 साल के शासनकाल के विवादों और अंदरूनी स्थितियों को इस फिल्म में बहुत सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया गया है।

द एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह के चरित्र के साथ किताब के अनुसार ही न्याय किया गया है। यह बताया गया है कि किस तरह से मनमोहन सिंह एक कमजोर प्रधानमंत्री से बेहद प्रभावशाली प्रधानमंत्री बने और उसके बाद उनके दूसरे टर्म में किस तरह से हालात बिगड़ते चले गए और कांग्रेस पार्टी द्वारा उन्हें बलि का बकरा बनाया गया।

फिल्म में यह भी स्पष्ट किया गया है कि मनमोहन सिंह जिन्हें बाद में मोनी सिंह कह दिया गया था वे वैसे नहीं थे लेकिन उन्होंने कई बार पार्टी और परिवार की मर्यादा के लिए अपने आप को पीछे हटाया और यही उनकी सफलता की वजह भी रही।

फिल्म में यह बताया गया है कि किस तरह से सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करने के बाद कांग्रेस पार्टी में जो हालात पैदा हुए। उसमें मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के तौर पर आगे लाया गया उसके बाद यह माना जा रहा था कि वे कठपुतली प्रधान मंत्री रहेंगे लेकिन धीरे-धीरे मनमोहन सिंह ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया और उनके कई फैसले जो पार्टी को पसंद नहीं थे उनके बारे में भी इस फिल्म में विस्तार से बताया गया है।

खासकर उस समय जब मनमोहन सिंह अमेरिका के साथ एनर्जी पर समझौता कर रहे थे और लेफ्ट पार्टी द्वारा समर्थन वापस लेने की धमकी दी गई थी। तब उनका कठोर चेहरा सामने आया कि किस तरह से उन्होंने उस स्थिति को फेस किया और अंततः समाजवादी पार्टी की मदद से उनकी सरकार बची।

कुल मिलाकर पूरी फिल्म में यह बताया गया है कि मनमोहन सिंह इतने कमजोर प्रधानमंत्री नहीं थे जितना कि उन्हें मीडिया द्वारा प्रदर्शित किया गया ।

संजय बारू जो कि उनके मीडिया सलाहकार थे उन्होंने यह बताया है कि किस तरह से उन्होंने उस स्थिति किया का सामना किया कुल मिलाकर यह पूरी फिल्म राजनीतिक उठापटक से भरी हुई है और फिल्म में 10 साल के शासनकाल पर आधारित घटनाओं को सवा 2 घंटे में जितना अधिक समेटा जा सकता था उतना समेटा गया है फिल्म के सभी पात्र बेहद प्रभावी हैं सोनिया गांधी की भूमिका में भी बेहद दम है और खासकर संजय बारू की भूमिका में अक्षय खन्ना ने तो कमाल ही कर दिया है वह पूरी फिल्म में छाए हुए रहते हैं।

अनुपम खेर ने अपने मनमोहन सिंह के पात्र के साथ पूरा न्याय किया है फिल्म इसलिए भी दर्शनीय है कि प्रधानमंत्री कार्यालय पर केंद्रित यह पहली राजनीतिक फिल्म है जिसमें अंदरूनी घटनाक्रमों को इतने अच्छे से फिल्माया गया है।

फिल्म के बहुत से घटनाक्रम ऐसे भी हैं जिसमें कांग्रेस पार्टी की छवि को नुकसान होने की संभावना दिखती है। लेकिन इस फिल्म में उन्हें भी बेहद बोल्ड तरीके से फिल्माया गया है फिल्म वाकई दर्शनीय है और राजनीति में रुचि रखने वालों को इस फिल्म को जरूर देखना चाहिए।

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