पूजा भी,इबादत भी : ईद के एक दिन पहले पावागढ़ में मत्था टेकने पहुंचा इंदौर का मुस्लिम युवक

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पावागढ़ | गुजरात के पावागढ़ शक्तिपीठ में रविवार की सुबह सब कुछ सामान्य था ,सिवा दो बातों के। पहला वहां का मौसम जो अगस्त में ही दिसंबर का एहसास करवा रहा था । बारिश के साथ चल रही सर्द हवा और बादलों की नमी ने कुछ लोगों को तो तापनेको मजबूर कर दिया । एक और बात जो हैरान कर रही थी ,वह यह कि पीली शर्ट पहने एक शख्स खूब हड़बड़ी दिखा रहा था ।उड़न खटोले में भी बार-बार घड़ी देख रहा था और सीढ़ियां भी भाग भाग कर चढ़ रहा था । पूछा तो बोला कल ईद है तो जल्दी घर पहुंचना है । बीवी मना कर रही थी लेकिन मैं चला आया। गुजरात की बारिश से डर भी लगा था लेकिन आ ही गया।हर साल ईद के पहले मां के दरबार मैं मत्था टेकने आता हूं। इंदौर के टार्जन शाह की बातें सुनकर हैरानी बड़ी तो कंधे पर हाथ रख कर बोले पक्का मुसलमान हूं साहब ,बस काली माता की कृपा मुझे यहां तक खींच लाती है ।

सिलसिला 5 साल से जारी

इंदौर के टार्जन शाह


टार्जन ने बताया की पावागढ़ आने का सिलसिला 5 साल से जारी है। पहली बार दोस्त कमलेश यादव के साथ गुजरात घूमने आया था ।उसने कहा कि कुछ मांगना हो तो मांग ले, मां निराश नहीं करेगी । मैंने मन्नत मांग लीऔर मा ने बिगड़ता काम बना दिया ।तब से लगन ऐसी लगी कि कोई भी रुकावट हो, सब को पार करके आ ही जाता हूं । खजराना के पास वाले मोहल्ले में रहता हूं। खजराना के काली मंदिर मैं भी सिर झुकाता हूं, लेकिन वहाँ कभी-कभार ही जाता हूं । धर्म वालों की वजह से थोड़ा झिझकता हूं ।

वैष्णो देवी और शिर्डी भी जा चुके है शाह
टार्जन ने बताया अपना काम बनाने की लालच में दोस्त के कहने पर एक बार शिर्डी भी गया था ,लेकिन वहां वह मजा नहीं आया । त्रंबकेश्वर , अमरनाथ और वैष्णोदेवी भी जा चुका हूं। बस पावागढ़ ही ऐसा है जहां मन लग गया है । ईद पर मां का प्रसाद भी घर ले जा रहा हूं। नवरात्रि में एक बार उपवास भी रखा था, पर वह लगातार नहीं रख पाया ।न जाने क्या हुआ शायद इच्छा शक्ति कमजोर पड़ गई । रोजे हर साल रखता हूं।

कमलेश तो 11 साल से आ रहे हैं

15 साल से पवागढ़ जा रहे कमलेश यादव


कमलेश यादव की कहानी भी ऐसी ही है । इंदौर के गांव राउ खेड़ी में रहते हैं ।11 साल से पावागढ़ आ रहे हैं ।कभी-कभी तो साल में तीन बार भी आ जाते हैं । देवी के 51 शक्ति पीठ के बारे में खूब जानते हैं । पावागढ़ के बारे में बताया कि यहां मां के दाएं पैर की उंगली गिरी थी तब से यह शक्तिपीठ बन गया ।जब माता सती का शव लेकर भगवान शिव यहां वहां भटक रहे थे तब विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र चलाया और सती माता के शव को छिन्न-भिन्न किया था।ताकि भगवान शिव को समझा कर दोबारा काम पर लौटया जा सके । पत्नी के वियोग में वह सब भूल गए थे। सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया था तब तब ब्रह्माजी ने विष्णु जी से कहा था कि आप ही कुछ करिए। फिर विष्णु जी ने इस दुख से भगवान शिव को निकाला था। कई लोग हैं जो अलग-अलग कहानियां बताते हैं, लेकिन मैं तो यही जानता हूं। अब अगर कोई शास्त्रों और धर्म का जानकार मुझसे नाराज हो जाए तो माफ़ कर देना।सांस लेने में मुझे परेशानी होती है लेकिन फिर भी इस ऊंचाई तक हर साल आता हूं। यहां की खासियत है कि अगर दोबारा आने का वादा करके जाओ तो मैं हर मन्नत पूरी कर देती है।


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