Breaking News

सम्मान भी सम्मानित तरीके से दिए जाएं, यह अब जरूरी नहीं है,वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल की टिप्पणी

Posted on: 05 May 2018 04:53 by Ravindra Singh Rana
सम्मान भी सम्मानित तरीके से दिए जाएं, यह अब जरूरी नहीं है,वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल की टिप्पणी

65 वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार वितरण समारोह राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के इस उद्भोधन कि अभिनेत्री श्रीदेवी और अभिनेता विनोद खन्ना को लंबे समय तक या‍‍द किया जाएगा, से ज्यादा इस बात के लिए याद रखा जाएगा कि इन पुरस्कारों के 131 में से 60 से ज्यादा विजेताअों ने इस प्रतिष्ठित आयोजन का बहिष्कार किया। वह भी सरकार की जिद के कारण। राष्ट्रपति ने तयशुदा कार्यक्रम के तहत महज 11 लोगों को अपने हाथों से पुरस्कार बांटे।

ramnath kovin

बाकी को सूचना प्रसारण मंत्री और पूर्व टीवी अभिनेत्री स्मृति ईरानी और इसी विभाग के राज्यमंत्री राजवर्धन सिंह राठौर ने पुरस्कार बांटे। लगभग आधे पुरस्कार विजेता फिल्म कर्मियों ने मंत्रियों के करकमलों से स्वर्ण और रजत कमल लेने के बजाए उन्हें न लेना ही बेहतर समझा। आयोजन में इस बदलाव के पीछे तकनीकी कारण कुछ भी बताएं जाएं, यह संदेश पूरे देश में गया कि संस्कृतिकर्मियों और फिल्मकारों की औकात सरकार की नजर में क्या है और ये पुरस्कार अब केवल एक खानापूर्ति से ज्यादा कुछ नहीं हैं।

iraani

देश में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की शुरूआत 1954 में तब हुई, जब देश में फिल्म निर्माण कला जवान हो रही थी। पहली बोलती‍ हिंदी‍ फिल्म बने 23 साल ही हुए थे। उसी दौर में यह माना गया कि फिल्मों में उत्कृष्टता को प्रोत्साहित करने और उसे सम्मानित करने के लिए फिल्मों, फिल्मकारों, अभिनेताअो, संगीतकारों, गायकों, तकनीशियनो, गीतकारों, संवाद लेखकों आदि को अलग अलग श्रेणियों में पुरस्कार दिए जाएं। पुरस्कारों का चयन राष्ट्रीय स्तर की एक जूरी करती है।

पुरस्कार के रूप में विजेताअोंको स्वर्ण कमल और रजत कमल प्रदान ‍िकए जाते हैं। बाद में इसमें लाइफ टाइम अचीवमेंट के लिए भारतीय फिल्म उद्दयोग के पितामह दादा साहब फाल्के की स्मृति में भी पुरस्कार शुरू किया गया। बीते 64 सालों में चंद विवादों के बाद भी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की अपनी अलग महत्ता और गरिमा रही है। चूंकि ये पुरस्कार राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जुड़े हैं, इसलिए इन्हे विशेष समारोह में स्वयं राष्ट्रपति प्रदान करते रहे हैं। राष्ट्राध्यक्ष के हाथों पुरस्कार लेने का अलग महत्व और आभा होती है।

ramnath

पूर्व में पुरस्कार ‍िकसे मिला, कैसे मिला अथवा किसे नहीं मिला, इसको लेकर तो विवाद होते रहे हैं। लेकिन पूरा पुरस्कार समारोह ही विवादित हो गया हो, और इसके विजेताअों में से आधे समारोह का बहिष्कार कर दें, यह विजेताअोंसे ज्यादा स्वयं सरकार के लिए शर्म का विषय है, भले ही सरकार इसे न मानें। ऐसे 60 से ज्यादा पुरस्कार विजेताअोंने बाकायदा सार्वजनिक पत्र जारी कर कहा कि वे पुरस्कार समारोह का बहिेष्कार कर रहे हैं और उन्होने किया भी। नाराज फिल्मकर्मियों ने डायरेक्टरेट ऑफ़ फ़िल्म फ़ेस्टिवल, राष्ट्रपति कार्यालय और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को लिखे पत्र में व्यथित भाव से लिखा- ‘यह विश्वास टूटने जैसा है। जो समारोह प्रोटोकॉल से बंधा हो, उससे जुड़ी इतनी महत्वपूर्ण जानकारी का पहले से न दिया जाना उचित नहीं।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि 65 साल पुरानी परंपरा एक पल में बदल दी गई।‘ अपनी फ़िल्म ‘द अनरिज़र्व्ड’ के लिए पुरस्कार पाने वाले समर्थ महाजन ने तो यह भी कहा कि जिन 11 लोगो को राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार पाने के योग्य माना गया, उनके चयन का आधार क्या था, समझना मुश्किल है। इस विवाद के बाद सरकार को समारोह स्थगित कर विवाद का सम्मानजनक हल निकालना चाहिए था। लेकिन कुछ नहीं हुआ। राष्ट्रपति ने 11 लोगों को पुरस्कार देकर इतिश्री कर ली। सरकार की अोर से ‍अधिकांश विजेताअों को राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार न देने का औचित्य ठहराते हुए लचर तर्क यह दिया गया कि महामहिम किसी भी कार्यक्रम में एक घंटे से ज्यादा नहीं रूकते। मान लिया। अगर ऐसा था तो पूरा पुरस्कार वितरण दो या तीन हिस्सों में किया जा सकता था, जैसे कि पद्म पुरस्कारों के संदर्भ में होता है।

सवाल यह है कि यह अशोभनीय स्थिति किस कारण से बनी? कुछ लोगों ने इसे सरकार और संस्कृतिकर्मियों के बीच सीधे टकराव माना। हालांकि पुरस्कार विजेताअों ने इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होने कहा कि वे केवल सम्मान भी सम्मानित तरीके से प्राप्त करना चाहते हैं। आशय यह है कि भारत सरकार की मंत्री की भी गरिमा है, लेकिन राष्ट्रपति के आगे वह बहुत छोटी है।

यह भी स्पष्ट नहीं है कि कार्यक्रम का शिड्यूल किसके कहने पर बदला गया। यह मान लेना कठिन है कि राष्ट्रपति इन पुरस्कारों को प्रदान करने के लिए मंच पर इतनी देर नहीं रूक सकते थे। क्योंकि एक तो उनके स्वास्थ्य को लेकर किसी को कोई संदेह नहीं है। दूसरे, वे अति विनम्र और सहिष्णु भी हैं। यह मप्र के गुना जिले के एक कार्यक्रम में प्रशासन की प्रार्थना पर उनके द्वारा 20 मिनट तक मंच के पीछे श्रोताअों की अविचल प्रतीक्षा से सिद्ध हो चुका है। इस घटना पर सरकार की अोर से कोई स्पष्टीकरण भी नहीं आया।

तो फिर प्रतिष्ठित फिल्मकारों को राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कृत करने के बजाए किसी अौर के हाथों पुरस्कार देकर चलता कर देने के पीछे क्या सोच और मानसिकता हो सकती है, यह गहरे मंथन का विषय है। जिन लोगों के नामों का चयन किया गया था, वह जूरी भी सरकार की बनाई हुई है। इसलिए नामों पर भी विवाद नहीं था। ऐसा लगता है कि सरकार खुद ही इस आयोजन की प्रतिष्ठा घटाना चाहती है।

क्योंकि उसकी नजर में फिल्मकारों को पुरस्कृत करने और नचैयों-गवैयों को इनाम-इकराम बांटने में ज्यादा फर्क नहीं है। ऐसे लोगों से सरकार को अपना एजेंडा पूरा करने में भी कोई खास मदद नहीं मिलती। पुरस्कारों की एक परंपरा चली आ रही है, सो इनाम बांट दिए। जिसे लेना हो ले, न लेना हो न ले। ये यजमान का दिया नेग है, जिस पर बहस बेमानी है। आपको दे दिया, यही क्या कम है। राष्ट्र निर्माण में आपकी जो दो टके की भूमिका है, उसकी कीमत कुल इतनी ही बनती है। वैसे भी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में से पांच तो पहले ही बंद हो चुके हैं। अगले साल बाकी के भी यहकर बंद कर दिए जाएं कि यह राष्ट्र के धन और समय का अपव्यय है तो हमे चकित नहीं होना चाहिए।

Latest News

Copyrights © Ghamasan.com