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पुरखे जगत से कभी विदा नहीं होते

Posted on: 07 Sep 2017 07:29 by Ghamasan India
पुरखे जगत से कभी विदा नहीं होते

पुरखे जगत से कभी विदा नहीं होते हैं
संतति के कण कण में रचे होते हैं

मज्जा नाड़ी रक्त में प्रवाहित होते हैं
चेतना प्रज्ञा स्मृति में समाहित होते हैं

देहरी आँगन द्वार दीवार में ढले होते हैं
ऐनक कुर्सी मेज कलम सब में बसे होते है

तीज त्यौहार प्रथा परम्पराओं में होते हैं
भूल चूक होते ही तस्वीरों में प्रगट होते हैं

हौंसलों उम्मीदों और सहारों में भी छिपे होते हैं
विचारों क्रियाओं विरासतों में अवश्य ही होते हैं

बोल चाल भाषा शैली हाव भाव सबमें होते हैं
पुरखे जगत से कभी विदा नहीं होते है

ज्येष्ठ भगिनी के चेहरे के पीछे छिपी माँ में उपस्थित होते हैं
ज्येष्ठ भ्राता के उत्तरदायित्वों में पिता ही विराजित होते हैं

पुरखे जगत से कभी विदा नहीं होते…..

पुरखे आसमान से नीचे आते आशीर्वादों में होते हैं
पुरखे धरती से ऊपर जाती श्रद्धाओं में होते हैं……

पुरखे जगत से कभी विदा नहीं होते हैं….

(पितरों को नमन)

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