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हँसाकर रुलाकर जीने की राह दिखाती ‘102 नॉट आउट’ वरिष्ठ पत्रकार विनोद नागर की टिप्पणी

Posted on: 06 May 2018 09:13 by Ravindra Singh Rana
हँसाकर रुलाकर जीने की राह दिखाती ‘102 नॉट आउट’ वरिष्ठ पत्रकार विनोद नागर की टिप्पणी

बालीवुड की फिल्मों का लगातार बदलता ट्रेंड न केवल दर्शकों की बदलती रूचि का परिचायक है बल्कि इससे फिल्मकारों की सृजनात्मकता मे नवोन्मेष का संचार भी होता है. नये विषय नये कथानक लेखकों को फिल्मों के नये जॉनर गढने की प्रेरणा देते रहे हैं. ढाई दशक पूर्व कैरियर की शुरूआत में छोटे मोटे रोल निभाकर पटकथा एवं संवाद लेखन में हाथ आजमाते हुए निर्देशक बने उमेश शुक्ला दर्शकों की नब्ज़ कितनी अच्छी तरह पहचानते हैं इसका सबूत उनकी पिछली दो फिल्में ‘ओ माय गॉड’ और ‘आल इस वेल’ दे चुकी हैं.

इस शुक्रवार प्रदर्शित उनकी ताज़ा पेशकश ‘102 नॉट आउट’ भी एक  बिल्कुल नये विषय पर केन्द्रीय भूमिकाओं में अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर जैसे दो समकालीन सितारों / स्थापित कलाकारों को 27 साल बाद रूपहले परदे पर एक साथ लेकर आई है. यह फिल्म सौम्या जोशी के इसी नाम से लोकप्रिय गुजराती नाटक पर आधारित है. संभवतः इसीलिए निर्माताओं ने कथा, पटकथा और संवाद लिखने का दायित्व भी उन्हें ही सौंपा.

अपने ढंग की इस अनूठी फिल्म की कहानी 102 वर्ष के वयोवृद्ध व्यक्ति दत्तात्रय वखारिया (अमिताभ बच्चन) की जिन्दादिली और बुलंद हौसलों पर केन्द्रित है. ये  शख्स वृद्धावस्था की तमाम दुश्वारियों के बावजूद अभी कुछ समय और जी कर दुनिया में चीन के सर्वाधिक उम्र के जीवित व्यक्ति का विश्व रिकार्ड तोड़ने की ख्वाहिश रखता है. जबकि उसके 75 वर्षीय पुत्र बाबूलाल वखारिया ( ऋषि कपूर) का स्वभाव इसके बिल्कुल विपरीत एकदम खडूस किस्म का है. दैनिक जीवन में दोनो बाप-बेटे की चिकचिक और नोक-झोंक हर दिन एक नया झमेला खड़ा करती रहती है.

हंसमुख भाई के मेडिकल स्टोर्स पर काम करने वाला धीरू (जिमित त्रिवेदी) इन दोनों की सेवा करते हुए इसका साक्षी बनता है. एक दिन दत्तात्रय अपने बेटे बाबूलाल को वृद्धाश्रम मे भरती कराने की घोषणा करता है. आम तौर पर बेवफा और मतलबी संताने बुढापे में अशक्त माँ बाप को उनके हाल पर बेसहारा छोड़ जाती हैं. लेकिन एक शतायु बाप अमृत महोत्सव मना चुके अपने बुजुर्ग बेटे को अवसाद से बाहर निकालने के लिए क्या क्या जतन नही करता. आगे की कहानी हल्के फुल्के अंदाज में पिता पुत्र के आपसी संबंधों के निर्वाह से ऊपजी गहरी मानवीय संवेदनाओं से दर्शकों का ऐसा साक्षात्कार कराती है जो हंसाता भी है और रूलाता भी है.

फिल्म की कहानी न केवल बेसहारा बुजुर्गों के एकाकी जीवन की कशमकश और जिजीविषा के अन्तर्द्वंद को न केवल दिलचस्पी से उभारती है, बल्कि उच्च शिक्षा, बेहतर नौकरी और विलासितापूर्ण जीवनशैली के आकर्षण के चलते विदेश में जा बसी कृतघ्न संतानों मुँह पर करारा तमाचा भी जड़ती है. निर्देशक उमेश शुक्ला ने हल्के फुल्के अंदाज़ में एक गंभीर सामाजिक सरोकार को उठाकर उसे अत्यंत मार्मिक परिणति तक पहुंचाया है वह उनकी पिछली फिल्मों से अर्जित प्रतिष्ठा में श्रीवृद्धि करने वाला है.

अलार्म लगाकर नहाने, सनसेट वृद्धाश्रम में बेटे को कॉर्नर का कमरा देने का अनुरोध, डायरी में बेटे से शर्तें लिखवाकर साइन कराने, सीमेंट कंक्रीट के हवाई जहाज़, सेबेस्टियन चर्च, और नरीमन पॉइंट की घोड़ा गाड़ी में गुजरे अतीत की यादें, बाबूलाल के जन्मदिन पर ‘मेरे घर आना ज़िन्दगी’ गीत का रिक्रिएशन, चन्द्रिका की मौत की याद का प्रसंग और पार्श्व में ‘वक़्त ने किया क्या हसीं सितम’ का उपयोग, घूमते ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड पर बेटे के बचपन की तस्वीर, अमोल के आने की तैयारी, एअरपोर्ट पर बेटे को उसके बचपन के फोटो का अल्बम दिखाने और अंत में प्रापर्टी के लालची बेटे को स्वदेश बुलाकर सबक सिखाने जैसे प्रसंग निर्देशकीय कौशल के प्रमाण हैं. लेह लद्दाख जाकर सबसे ऊँचे पोस्ट ऑफिस से परिजनों को चिट्ठी लिखने की ख्वाहिश भी फिल्म की कहानी को नया मोड़ देती है. ‘बच्चे की जान लोगे क्या’ गीत अच्छा बन पड़ा है.

दत्तात्रय वखारिया की भूमिका में अमिताभ बच्चन स्वयं को ब्लैक, पा, पीकू और पिंक से सौ कदम आगे ले जाते हैं. एंग्री यंग मेन मार्का फिल्मों के दौर में इस महानायक के उत्तरार्ध में नित नए सोपान की मौजूदा सक्रियता की कल्पना शायद ही किसी ने की हो. तीस साल से विदेश में जा बसे बेटे की बाट जोहते भावुक पिता के किरदार में ऋषि कपूर ने जो कमाल किया है वह उन्हें 45 साल के फ़िल्मी कैरियर में मोर मुकुट के बतौर याद रखा जायेगा.

कुछ मार्मिक दृश्यों में तो वे सिर्फ आंखों की चमक के जरिये बरबस ही अपने पिता राजकपूर के सच्चे उत्तराधिकारी की छाप छोड़ते हैं जबकि उम्र के सठियाए दौर में सोशल मीडिया पर हाइपर सक्रियता ने उनकी अजीबोगरीब छवि गढ़ रखी है. दवा की दुकान पर काम करनेवाले गुजराती युवक धीरू को शांति निवास दोनों बुढऊ की सेवा में मिलनेवाले जॉब सेटिसफेक्शन जिमित त्रिवेदी ने अच्छे से उभारा है. फिल्म की कहानी में नारी पात्र के रूप में बाबूलाल की पत्नी चंद्रिका का जिक्र बार बार होता है पर जिस कुशलता से निर्देशक ने बिना किसी अभिनेत्री को लिए मात्र तीन पुरुष कलाकारों के दम पर ‘102 नॉट आउट’ रची है वह अद्भुत है.

फिल्म को बाप बेटे की अजीबोगरीब प्रेम कहानी निरुपित किया जाना सार्थक है. प्रोस्थेटिक मेकअप की आधुनिक तकनीक ने अमिताभ और ऋषि जैसे सिद्धहस्त कलाकारों को किरदार के अनुरूप ढलने में अपेक्षित मदद की है. फिल्म देखने की बाद यह कपोल कल्पना करने मे क्या हर्ज है कि कुछ दशक बाद यदि किसी को ‘102 नॉट आउट’ का रीमेक बनाने की सूझी तो क्या अभिषेक बच्चन और रणवीर कपूर ऐसी उदार पेशेवर प्रतिबद्धता दिखा पाएँगे?
फिल्म के संवाद रोचक हैं- इस उम्र में सिंगल नहीं डबल प्रीकॉशन लेना चाहिए.. वो सत्य के प्रयोग थे ये मूत्र के प्रयोग हैं.. मैंने अपना बुढापा स्वीकार किया है, इस उम्र में मुझे कुछ डिस्कवर नहीं करना..

यह छोड़ो वह छोड़ो कहकर तुमने जीना ही छोड़ दिया.. इसके अस्तित्व में डॉ. मेहता के क्लिनिक की बू आती है.. औलाद नालायक निकले तो उसे भूलजाना चाहिए, सिर्फ उसका बचपन याद रखना चाहिए.. तेरे बेटे को मैं अपने बेटे के सामने जीतने नहीं दूंगा.. घर बहुत छोटा है और हम लोग बहुत बिजी हैं आप बोर हो जाओगे यहाँ.. तेरा बेटा जिसे अल्ज़ाईमर नहीं है जब वही तुझे भूल चुका है तो तू क्यूँ उसे याद कर के मरा जा रहा है.. मै अपने जीवन में आजतक कभी नहीं मरा.. आई होप यू अंडरस्टैंड.. अमोल तेरा बेटा नहीं केटरेक्ट है जो तुझे फिर से अंधा कर देगा.. लोग तुम्हे नहीं मुझे देख रहे हैं 21 साल से तमाशा तो मै बना हुआ हूँ.. प्रापर्टी में तेरा हिस्सा यही है, चल पकड़ अपने बचपन की गुल्लक और निकल जा यहाँ से.. आसमान में अपने लिए एक छोटा सा स्पॉट ढूँढ रहा हूँ.. इस दुनिया में अमोल है तो धीरू भी है..

(लेखक वरिष्ठ फिल्म समीक्षक हैं )

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