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” मुखर जी प्रणव ” सुरेंद्र बंसल की जबरदस्त टिप्पणी

Posted on: 08 Jun 2018 09:46 by Ravindra Singh Rana
” मुखर जी प्रणव ” सुरेंद्र बंसल की जबरदस्त टिप्पणी

इसके पहले कि मैं प्रणव मुखर्जी के आज संघ के मंच से कही बातों का विवेचन करूँ , कोई चार घंटे पूर्व मेरे इस आलेख के मूल तत्व पर एक नज़र गौर कीजिए…..प्रणब दा जहां अपनी हैसियत की सर्विसिंग करके नए रूप में प्रकट हो रहे है ऐसे उनके आरएसएस के कार्यक्रम में पदार्पण के कुछ ही मायने हैं एक – वे संघ के भीतर संघ को नसीहत दें दो- वे संघ को बचाकर बीजेपी को नसीहत दें तीन- वे अपनी ही पार्टी को राष्ट्रवाद की तरफ बढ़ने की प्रेरणा दें और चार – वे संयत और संयम से संतुलित शब्दों में अपरोक्ष रूप से राष्ट्र हित और लोक हित की बात करें और बिना किसी झमेले के वापस आ जाएं।

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क्या यही कुछ नहीं कहा प्रणव दा , क्या उनकी सब कुछ यही तो नहीं कहा प्रणव दा ने। बिल्कुल ठीक प्रणव मुखर्जी यही बोले हैं उन्होंने संयत और संतुलित शब्दों में राष्ट्र और राष्ट्रीयता की बात की लेकिन खास यह कि उन्होंने पूरे संयम से संघ , बीजेपी और कॉन्ग्रेस को भी भारतीयता के मायने सांस्कृतिक और सहिष्णुता के भाव के साथ समझा दिए। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की संरचना को भी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से बखूबी रेखांकित किया ,उन्होंने स्पष्ट किया मेरी यहां उपस्थिति क्यों है यह मैं राष्ट्र, राष्ट्रवाद और देशभक्ति की भावना को साझा करने आया हूँ।

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वे बेखौफ़ बोले , मुखरता से भी बोले
लेकिन सख्त होकर किसी को धता नहीं दिखाई ,संतुलित भाव से सबको जता गए राष्ट्रवाद क्या है , सहिष्णुता क्या है , लोकतंत्र कैसे आया है और विविधता में एकता का अभिप्राय क्या है।

फिर भी प्रणव दा वही बोले जो संघ अपनी नीतियों में प्रचारित करता रहा है, संघ हमेशा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सहिष्णु समाज के साथ पूर्ण भारतीयता की बात करता रहा है इस मायने से संघ इसे अपने पक्ष में ले सकता है वही कांग्रेस इसलिए संतुष्ट हो सकती है कि उन्होंने नेहरू को भी याद किया और लोकतंत्र के लिए सबके योगदान को प्रचारित किया।

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मुखरता से मुखर्जी ने जी कुछ कहा वह संघ की धारा और एकात्म भाव से भिन्न नहीं था यहां तक कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी कमोबेश वही भाव प्रकट किए जो मुखरजिने बाद में कहे। दोनों का प्राकट्य स्वरूप अलग था लेकिन भाव एज थे ,जब भागवत बोल रहे थे तब वे ही बातें एक विचार एक नीति के रूप में थी और वही बातों को जब प्रणव मुखर्जी संवाद प्रेषण की तरह कर रहे थे तब सबके सख्त नसीहतें तो नहीं सदाचरण की सीख की तरह थी।

अब तक प्रणव मुखर्जी की संघ कार्यक्रम में जाने की आलोचना कर रही कान्ग्रेस इसे संघ को दी नसीहतों की तरह प्रचारित करेगी और उसने यह कहना शुरू भी कर दिया है।

बीजेपी को भी माना जा सकता है सहिष्णुता और विविधता में एकता पर मुखर्जी ने कुछ सीख दी है लेकिन कुल मिलाकर संयत, संयमित और संतुलित बातें मुखरता से कर प्रणव दा आज “मुखर जी प्रणव” हो गए हैं।

surendra bansalसुरेंद्र बंसल

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