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ब्रह्मलीन बाबा बजरंगदास की तपःस्थली में दिवाली मनाएंगे ‘दिग्गी’

Posted on: 18 Oct 2017 06:30 by Ghamasan India
ब्रह्मलीन बाबा बजरंगदास की तपःस्थली में दिवाली मनाएंगे ‘दिग्गी’

भोपाल। हमारे शास्त्रों में एक निर्देशवाक्य है – ‘‘रेवा तटे तपः कुर्यात्, मरणम जाह्नवी तटे’’ । तप, जो व्यक्ति की क्रियाशक्ति, इच्छाशक्ति के साथ-साथ समग्र जीवन को पूर्णता प्रदान कर उसकी समस्त शक्तियों को समाजोन्मुख बनाने एक मात्र सशक्त माध्यम है। हमारे तपपूत ऋषियों ने धर्म, दर्शन संस्कृति, विज्ञान आदि क्षेत्रों में जिन कालजयीे शाश्वत नियमों और सिद्धान्तों की खोज कर हमारी गौरवमयी परम्परा को और भी समृद्ध बनाया है, निश्चित रूप से उसकी साधनगत पृष्ठभूमि पुण्य सलिला भगवती नर्मदा के पावन तटपर, इसकी विस्तीर्ण रेत, शिलाओं और इसके मनोरम वन प्रन्तरों में ही निर्मित हुई थी।

गौतम, कपिल, च्यवन, पिप्पलाद, मारकण्डेय, परशुराम, कर्दम, आर्गसर, गोविन्दपादाचार्य, मंडन मिश्र, दयानन्द सरस्वती आदि अनेकानेक ऋषियों व महर्षियों की पुण्य तपः स्थली आज भी भगवती माँ नर्मदा के दोनों सुरम्य तटों पर अपनी ऐतिहासिक सत्यता के साथ विद्यमान है ।भगवती नर्मदा की इस सतत् अविच्छिन्न सिद्ध परम्परा में एक अविस्मरणीय नाम है, प्रातः स्मरणीय पूज्य बाबा बजरंगदास जी महाराज का। भगवती रेवा के दक्षिण तट पर, चिचोट खेडा नामक स्थान पर, आप ने पर्णकुटी स्थापित कर यहां रहना आरम्भ किया था और इसी कुटिया में 13 फरवरी 1979 को 108 वर्ष की अवस्था में आप ने महासमाधि ली।

शास्त्र प्रमाण की दृष्टि से यह स्थान सांख्य दर्शनकार भगवान कपिल एवं आयुर्वेद के परमाचार्य महर्षि च्यवन की तपस्या भूमि रही है। आज तक भी इस भूमि पर यह दोनों प्रभाव क्षीण नहीं हुए हैं और स्वतः ही क्रियाशील रहकर अपनी सत्यता व जीवन्तता का परिचय देते रहते हैेे। यह स्थान है ही कुछ ऐसा रमणीक जहां प्राकृतिक सुषमा, उसकी शांति और पवित्रता सजीव होकर संवाद सी करती प्रतीत होती है।

पूज्य बाबा बजरंगदास जी उर्फ दादाजी ने इस कुटिया के अध्यात्मिक भवन को चार पायों पर प्रतिष्ठित किया। ये हैं संयम, साधना, प्रेम और सेवा । इसके लिए न तो उन्होने कोई व्याख्या ग्रंथ लिखे और न ही उसकी कोई पांडित्यपूर्ण व्याख्या की अथवा प्रवचन दिए। यह उनका जीवन था, जो मौन रहते हुए भी स्वयं में सबसे बड़ा और प्रमाणिक व्याख्यान था कुटिया वासियों और इस क्षेत्र की जनता का यह परम सौभाग्य है कि पूज्य बाबाजी के रूप में उन्होंने प्रेम को साक्षात् देखा हैं, उसे जाना और समझा है । यही कारण है कि आज भी प्रसंग छिड़ने पर दादा जी की स्मृतियां क्षेत्र की जनता की आंखों को अभी भी नम बना देती ह।

उनका स्वयं के जीवन से निःसृंत एक सीधा सादा पर अति दूरूह उपदेश था ‘ज्ञानी’ वही है जो सबसे प्रेम कर सके । महावीर वही है जो कंचन और कामिनी के प्रभाव से मुक्त हो पूज्य दादाजी का चमत्कारों की दुनियां से दूर का भी सम्बन्ध नहीं था । पर इतना अवश्य था, (यदि यह किन्हीं अर्थो में चमत्कार हो सकता है तो) कि उनकी अमृत तुल्य औषधियों ने इस क्षेत्र में सैकड़ों मृतप्राय से लोगों को नया जीवन प्रदान किया था।

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह जी को नर्मदा जी की असीम कृपा से ही ब्रह्मलीन बाबा बजरंगदास जी की तपःस्थली चिचोट कुटी जैसे सिद्ध व दिव्य स्थान में दीपावली मनाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। यह स्थान मध्यप्रदेश के हरदा जिले के छीपानेर के ग्राम चिचोट खेड़ा में स्थित है।

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