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बेलगाम लोकतंत्री राजा,अय्याश राजतंत्रियों से भी निकम्मे निकले,सतीश जोशी कि कलम से….

Posted on: 07 Jun 2018 11:38 by krishnpal rathore
बेलगाम लोकतंत्री राजा,अय्याश राजतंत्रियों से भी निकम्मे निकले,सतीश जोशी कि कलम से….

सांसद, विधायक, मंत्री चार दिन की सत्ता को जागीर समझने लगते हैं। कुर्सी पर बैठकर उसे यह लगता है कि सत्ता का पट्टा अब उसके नाम है। सरकारी धन को अपने बाप का माल समझकर लूट मचा रखी है। इनके खर्च देखो तो बाबा आदम के जमाने के अय्याश राजाओं को भी मात कर रहे हैं। संसद, विधानसभा में सस्ती थाली चाटते ये आधुनिक राजा लोकतंत्र में राजतंत्र को मात कर रहे हैं। सत्ता क्या मिली, जैसे कुबेर का खजाना मिल गया, इनके खर्चे देखो तो आँख फटी की फटी रह जाएगी। धनतंत्र के बेलगाम घोड़े आम आदमी से वसूली “कर राशि” पर एेश कर रहे हैं।

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देश मे कुल 4582 विधायकों पर हर साल  औसतन 7 अरब 50 करोड़ ₹ खर्च होते हैं।इसी तरह 790 सांसदों पर सालाना 2 अरब 55 करोड़ 96 लाख रुपये खर्च होते हैं।तमाम राज्यपाल, उपराज्यपालो पर 1 अरब 8 करोड़ ₹ सालाना खर्च होते हैं । सरकारी धन के इस खर्च में प्रधानमंत्री ओर तमाम राज्यो के मुख्यमंत्रियों का खर्च नहीं जोड़ा है । मतलब सत्ता किसी की भी रहे रईसी किसी की कम होते दिखती नहीं।via
ये भारत के भाग्य विधाता हैं।जब चुनाव लड़ने हमारे दरवाजे पर आते हैं तो लपलपाती जुबान से वोट का शिकार बटोरने के लिए सपने परोसते हैं, जैसे शेर का शिकार करने के लिए मेमने को बांधकर शिकारी जैसे जाल बिछाता है। मकोड़ों को देखकर छिपकली कैसी लपकती है। वोट के भूखे भेड़िये हाथ जोड़कर हमारे दरवाजे पर एेसे ही पहुंचते हैं। सत्ता मिलते ही अय्याशी हावी हो जाती है। उसकी सत्ता में  भी  जो यह कहते हैं कि “न खाऊंगा, न खाने दूंगा” , पूर्ववर्ती सरकारों  जैसे ही धन लूटा रही है।

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ये आधुनिक राजाओं की रहीसी उस समय कितनी निर्लज्ज हो जाती है जब ये अलग-अलग राज्य में जनता को सस्ते भोजन की पुड़िया बांटते हैं। कहीं “अम्मा केंटिन, कहीं इंदिरा कैंटिन, कहीं दिनदयाल थाली तो सस्ता बड़ा पाव” वोट के लिए उस मेमने की तरह लगते हैं, जो शेर का शिकार करने के लिए बांधे जाते हैं। रोटी का मजाक उड़ाते ये कैंटिन, गरीब की भूख को रोटी के जरिये वोट का सौदा करती मंडी जैसे लगते हैं।

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ये कैंटिन, आजादी के तरानों की मजाक उड़ाते लगते हैं। निर्लज्ज राजनीति का झंडा उठाए सांसद, विधायकों का खर्च आजादी के लिए शहादत देने वालों का अपमान करता लगता है। गरीब की भावनाओं, सपनों, राष्ट्रवाद के नारों को सत्ता के मदहोश हाथी अपने भारी भरकम खर्चों, रहीसी के पैरों तले रौंद ही तो रहे हैं। बेलगाम लोकतंत्री राजा अय्याश राजतंत्री राजाओं से भी ज्यादा निकम्मे निकले।

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