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नागपुर में संघ मुख्यालय पर बोले प्रणब मुखर्जी

Posted on: 07 Jun 2018 15:33 by Lokandra sharma
नागपुर में संघ मुख्यालय पर बोले प्रणब मुखर्जी

– भारत खुला समाज है। भारत सिल्क रूट से जुड़ा हुआ था। हमने संस्कृति, आस्था, आविष्कारों और महान व्यक्तियों की विचारधारा को साझा किया है। बौद्ध धर्म पर हिंदुओं का प्रभाव रहा है। यह भारत, मध्य एशिया, चीन तक फैला। मैगस्थनीज आए, हुआन सांग भारत आए। इनके जैसे यात्रियों ने भारत को प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था, सुनियोजित बुनियादी ढांचे और व्यवस्थित शहरों वाला देश बताया।

राष्ट्रवाद का फलसफा वसुधैव कुटुंबकम से आया
– यूरोप के मुकाबले भारत में राष्ट्रवाद का फलसफा वसुधैव कुटुंबकम से आया है। हम सभी को परिवार के रूप में देखते हैं। हमारी राष्ट्रीय पहचान जुड़ाव से उपजी है। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में महाजनपदों के नायक चंद्रगुप्त मौर्य थे। मौर्य के बाद भारत छोटे-छोटे शासनों में बंट गया। गुप्तों का शासन खत्म हो गया। कई सौ सालों बाद दिल्ली में मुस्लिम शासक आए। बाद में इस देश पर ईस्ट इंडिया कंपनी ने कई साल राज किया।

– गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था- कोई नहीं जानता कि दुनियाभर से भारत में कहां-कहां से लोग आए और यहां आकर भारत नाम की व्यक्तिगत आत्मा में तब्दील हो गए। कांग्रेस के सुरेंद्रनाथ बैनर्जी ने अपने भाषण में राष्ट्रवाद का जिक्र किया था। महान देशभक्त बाल गंगाधर तिलक ने कहा था कि स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।

– उन्होंने कहा-हमारी राष्ट्रीयता को रूढ़वादिता, धर्म, क्षेत्र, घृणा और असहिष्णुता के तौर पर परिभाषित करने का किसी भी तरह का प्रयास हमारी पहचान को धुंधला कर देगा। हम सहनशीलता, सम्मान और अनेकता से अपनी शक्ति प्राप्त करते हैं और अपनी विविधता का उत्सव मनाते हैं। हमारे लिए लोकतंत्र उपहार नहीं, बल्कि एक पवित्र काम है। राष्ट्रवाद किसी धर्म, जाति से नहीं बंधा।
– पचास साल के अपने सार्वजनिक जीवन के कुछ सार आपके साथ साझा करना चाहता हूं। देश के मूल विचार में बहुसंख्यकवाद और सहिष्णुता है। ये हमारी समग्र संस्कृति है जो कहती है कि एक भाषा, एक संस्कृति नहीं, बल्कि भारत विविधता में है। 1.3 अरब लोग 122 भाषाएं और 1600 बोलियां बोलते हैं। 7 मुख्य धर्म हैं। लेकिन तथ्य, संविधान और पहचान एक ही है- भारतीय।ज्ज्
– मेरा मानना है कि लोकतंत्र में देश के सभी मुद्दों पर सार्वजनिक संवाद होना चाहिए। विभाजनकारी विचारों की हमें पहचान करनी होगी। हम सहमत हो सकते हैं, नहीं भी हो सकते। लेकिन हम विचारों की विविधता और बहुलता को नहीं नकार सकते।

– हिंसा से डर का भाव आता है, हिंसा को नकारना चाहिए। लंबे समय तक हम दर्द में जिए हैं। शांति, सौहाद्र्र और खुशी फैलाने के लिए हम संघर्ष करना चाहिए।
– हमने अर्थव्यवस्था की बारीक चीजों और विकास दर के लिए अच्छा काम किया है। लेकिन हमने हैप्पिनेस इंडेक्स में अच्छा काम नहीं किया है। हम १३३वें नंबर पर हैं। संसद में जब हम जाते हैं तो गेट नंबर छह की लिफ्ट के बाहर लिखा है- जनता की खुशी में उसके राजा की खुशी है। …कौटिल्य ने लोकतंत्र की अवधारणा से काफी साल पहले जनता की खुशी के बारे में कहा था।
– गांधी जी ने कहा था कि हमारा राष्ट्रवाद आक्रामक, ध्वंसात्मक और एकीकृत नहीं है। डिस्कवरी ऑफ इंडिया में पं. नेहरू ने राष्ट्रवाद के बारे में लिखा था- मैं पूरी तरह मानता हूं कि भारत का राष्ट्रवाद हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई और दूसरे धर्मों के आदर्श मिश्रण में है।
-प्रणब दा ने जय हिंद और वंदेमातरम के साथ अपना भाषण समाप्त किया।

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