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इशारों को अगर समझो…

Posted on: 07 Jun 2018 18:01 by Lokandra sharma
इशारों को अगर समझो…

अमित मंडलोई

आरएसएस मुख्यालय नागपुर में प्रणब मुखर्जी के वेजिटेरियन भाषण से कई लोगों को बड़ी निराशा हाथ लगी है। जितने गौर से पूरी दुनिया इस भाषण को सुन रही थी, सभी को उम्मीद थी कि प्रणब दा भगवा दल को कोई बड़ी नसीहत दे देंगे। हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर ऐसा कुछ नहीं कहा, लेकिन इशारों में वह सबकुछ कह दिया, जो मौजूदा दौर में देश के बुजुर्ग राजनेता से अपेक्षित था। किसी को तिल का ताड़ बनाने का मौका भी नहीं मिला और उनका काम भी हो गया। सियासत में बातों के किफायती इस्तेमाल का ये शऊर खत्म हो चला है।

प्रणब दा का भाषण उसी दिन से चर्चा में था, जिस दिन उन्होंने आरएसएस
मुख्यालय का आमंत्रण स्वीकार किया था। सभी खेमों में खलबली मची हुई थी कि आखिर प्रणब दा ने ऐसा क्यों किया। वर्षों से प्रणब दा के साथ न्याय न करने के आरोपों से घिरी कांग्रेस के खेमे बेचैनी ज्यादा थी। बंगाल की सियासी हालत को देखते हुए उसकी वजह भी साफ नजर आ रही थी। डर था कहीं प्रणब दा उत्तरार्द्ध में उस ठौर ही न चले जाएं। यहां तक कि प्रणब दा की बेटी शर्मिष्ठा ने भी इस पर आपत्ति जताई और इसे गलत निर्णय बताया। हालांकि इससे प्रणब दा पर कोई असर नहीं हुआ।

आरआरएस और भाजपा भी इसे लेकर बेचैन थी, क्योंकि इतने सवाल आ रहे थे कि समझना मुश्किल था। खुद आरएसएस को कई बार सफाई देना पड़ी कि इसके पहले भी महात्मा गांधी सहित कई कांग्रेसी संघ के कार्यक्रम में आ चुके हैं। इसमें कुछ भी नया नहीं है। मीडिया में कहानियां चल पड़ीं कि कौन कांग्रेसी संघ के बारे में क्या विचार रखता था। किसने संगठन पर पाबंदी लगाने की सिफारिश की थी। भाषण होने से पहले राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया। यहां तक कि भाषण से पूर्व संघ प्रमुख मोहन भागवत को भी इस पर सफाई देना पड़ी। कहना पड़ा कि इस मसले पर इतनी बात करना उचित नहीं है। प्रणब दा ने जब संघ संस्थापक को भारत माता का महान् सपूत लिखा तो और बेचैनी बढ़ गई। पता नहीं वे क्या कहने वाले हैं।

खैर, प्रणब दा ने तमाम तर्क-वितर्क और आपत्तियों को दरकिनार कर बड़ी सहजता के साथ अपना भाषण शुरू किया। आते ही कहा, मैं देश और देशभक्ति समझाने आया हूं। उन्होंने पुरातन भारत का पूरा इतिहास उडेलकर रख दिया। नालंदा, तक्षशिला से लेकर चंद्रगुप्त, अशोक के साम्राज्य को याद किया। देश की सांस्कृतिक धरोहर को साझा करते हुए कहा, राष्ट्र की हमारी परिभाषा यूरोप से अलग है। हम विभिन्नताओं का सम्मान करते हैं। यही राष्ट्रीयता हमारी पहचान है। हिंदू एक उदार धर्म है, सहिष्णुता और सहजीवता हमारी ताकत है।

अशोक का उदाहरण देते हुए उन्होंने साफ कहा कि विश्व विजय के बावजूद उन्होंने शांति का प्रचार किया। मुस्लिम और अंग्रेज शासन को याद करते हुए वे स्वतंत्रता प्राप्ति के संघर्ष तक आए। कांग्रेस के जन्म की कहानी सुनाई और राष्ट्रीयता की परिभाषा भी बताई कि कैसे उसमें पूरा देश समाहित है। देश के प्रति निष्ठा ही देशभक्ति है। उन्होंने महात्मा गांधी, बालगंगाधर तिलक और जवाहरलाल नेहरू को भी याद किया। बार-बार राष्ट्रीय दृष्टिकोण की जरूरत पर लौट कर आए। धर्म, भाषा, प्रांत के आधार पर भेदभाव को खारिज करते रहे।

देश की विरासत की सराहना करते हुए उन्होंने कहा, हमारे अंदर यह क्षमता व साहस है कि हम दूसरों से सीख सकते हैं। देश में 122 भाषाएं और 1600 बोलियां हैं, कई धर्म हैं, सबके बीच संवाद जरूरी है। देश में सब मिलजुलकर रहें, एक-दूसरे का सम्मान करें, तभी भारत समृद्ध हो पाएगा। अभी तक हम चुनौतियों से संघर्ष करते रहे हैं, आगे बढ़ते रहे हैं। हमें शांति के लिए आगे बढऩा होगा। सब की प्रसन्नता, स्वास्थ्य और सकारात्मकता ही हमारा दायित्व है।

मौजूदा हालात पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, हमारी अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लेकिन फिर भी हम बहुत कुछ नहीं कर पाए हैं। हमें और आगे बढऩे की जरूरत है। आखिर में संसद में लिखे कौटिल्य के श्लोक का उद्धरण देते हुए बोले, लोगों की प्रसन्नता में ही राजा की प्रसन्नता है, लोगों का कल्याण ही राजा का कल्याण है और जिसमें लोगों का भला हो, उसी का प्रयास राजा को करना चाहिए। जय हिंद और वंदेमातरम के साथ उन्होंने अपनी बात समाप्त की।

देश की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के लिए इससे बड़ी नसीहत और क्या हो सकती है कि वह धर्म, जाति और प्रांत के विभेदों से उठकर सबकी खुशी और समृद्धि के लिए काम करे। लोगों से सीखने में परहेज न करे और सहिष्णुता रखे। साम्राज्य प्राप्ति के बाद उत्श्रृंखल न हो जाए, शांति का प्रचार करे। अगर बात सही कानों तक पहुंची हो तो बहुत कुछ कह दिया गया है। समझ सको तो समझ लो।

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