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इफ्तार पार्टियों की राजनीतिक प्रासंगिकता उतार पर क्यों ? अजय बोकिल की कलम से

Posted on: 08 Jun 2018 09:26 by krishna chandrawat
इफ्तार पार्टियों की राजनीतिक प्रासंगिकता उतार पर क्यों ? अजय बोकिल की कलम से

जाने-माने पत्रकार राशिद किदवई ने अपने एक ताजा लेख में देश में राजनीतिक इफ्तार पार्टियों के अस्त होते सूर्य की अोर ध्यान दिलाया है। हाल में राष्ट्रपति भवन से खबर आई कि वहां अब सरकार पैसे से कोई धार्मिक आयोजन नहीं होगा। इसका सीधा मतलब था कि वहां कोई इफ्तार पार्टी तो नहीं ही होगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने यहां इफ्तार पार्टी पर पहले ही रोक लगा चुके हैं। देश के अन्य राजभवनों में भी इफ्तार पार्टी को लेकर कोई हलचल नहीं है। इधर मध्यप्रदेश में भी अब तक कोई सुगबुगाहट नहीं है कि इस बार मुख्यंमंत्री निवास में इफ्तार पार्टी होने वाली है। इसके विपरीत अमेरिका से खबर आई कि घोर मुस्लिम विरोधी समझे जाने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में आने के दो साल बाद पहली बार इफ्तार पार्टी दी, जिसमें दुनिया भर से मुस्लिम देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। ट्रंप ने कहा कि हम ‘एक साथ काम करके ही सभी के लिए सुरक्षित और समृद्ध भविष्य हासिल कर सकते हैं।

इन खबरों से यह अर्थ‍ लिया जाना उचित नहीं होगा कि इफ्तार पार्टियां न होने से हाहाकार की कोई स्थिति है या फिर राजनीतिक दलों के लिए वोटों का ‘ इफ्तार’ अब बेमानी है। यहां यह सवाल जेहन में उठना स्वाभाविक है कि इफ्तार पार्टियां ‍किस मकसद से शुरू हुईं और अब क्यों अप्रासंगिक होती जा रही हैं, जबकि न तो माह-ए-रमजान का महत्व कम हुआ है और न ही धार्मिक दृष्टि से इफ्ताकर में कोई कमी आई है। यह सवाल इसलिए भी प्रांसगिक है कि रमजान खत्म होने में डेढ़ हफ्ते बाकी है, लेकिन इसकी कोई अनुगूंज राजन‍ीतिक हल्कों में दिखाई नहीं दे रही है। न तो इस बहाने मुसलमानों से नजदीकी जताने और न ही सिर पर नमाजी टोपी पहनकर फोटो खिंचवाने की कहीं कोई उत्सुकता है। इस्लाम में रमजान साल का सबसे पवित्र, ईश्वर की आराधना, आत्मशुद्धि, संयम और पुण्य कार्यों का महिना है। इफ्तार अरबी भाषा का शब्द है और इसके मायने यही है कि रोजा खोलने के लिए किया जाने वाला स्वल्पाहार। यह सूर्यास्त के तुरंत बाद नमाज अदा करने के बाद किया जाता है। उसका सियासत से कोई लेना देना नहीं है। यह कोई उस अर्थ में ‘पार्टी’ भी नहीं है कि जिसमें जमकर दावत उड़ाई जाए। संयमित आहार ही इसका मकसद है।iftar parti

इसके बावजूद राजनीति ने इफ्तार में भी ‘पार्टी’ खोज ली तो इसके पीछे कुछ कारण हैं। इफ्ता‍र पार्टी में देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय का जमावड़ा होता है। बिना मुसलमानों के इफ्तार पार्टी हो ही नहीं सकती। राजनीतिक इफ्तार पार्टी में कई जगह इसी बहाने विविध पकवान परोसे जाते हैं। मुसलमानों की खुशी के लिए कई लोग नमाजी टोपी भी पहन लेते हैं। रमजान की मुबारकबाद दी जाती है। यह संदेश देने की कोशिश रहती है कि मुसलमान हमारे भाई हैं और राजनीतिक दृष्टि से भी हमारे साथ हैं। पूरी तरह से साथ न भी हों तो उनका हमारे प्रति सदभाव है। सदभाव भी न हो तो वे हमारे ‘दुश्मन’ तो कतई नहीं है। चूंकि इफ्ता र भी सामूहिक रूप से होता है, इसलिए रोजा खोलने के आहार में एक राजनीतिक तत्व अपने आप शामिल हो जाता है, भले ही इसका अनुवाद किसी पार्टी को पड़ने वाले वोटों में हो या न हो। फिर भी इफ्ताकर नेताअों के लिए एक समुदाय की गोलबंदी की संभावनाएं पैदा करता है।indira gandiइस साल तो आरएसएस के अनुषांगिक संगठन राष्ट्रीय मुस्लिम मंच ने भी मुंबई में इफ्तांर पार्टी आयोजित की थी। मंच की राज्य की इकाई ने ऐसी ही पार्टी संघ मुख्यालय में आयोजित करने की इजाजत मांगी थी, जिसे यह कहकर नकार दिया गया कि संघ मुख्यालय ऐसे आयोजनों की जगह नहीं है। पत्रकार किदवई के अनुसार इफ्तार के राजनीतिक महत्व को सबसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पहचाना और प्रधानमंत्री आवास में इफ्तार पार्टियों का आयोजन शुरू किया। बाद में यह परंपरा बन गई। राष्ट्रपतिय भवन और मं‍त्रियों के यहां भी ऐसे आयोजन होने लगे। नेताअों ने इसे अपनी राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में लेना शुरू किया। जिसके यहां जितनी बड़ी इफ्ताेर, उतना ही बड़ा उसका सियासी रसूख। हालांकि अटलजी और मनमोहन सिंह ने स्वयं इफ्तार पार्टी आयोजित करने के बजाए अपने मुस्लिम सहयोगियों के माध्यम से यह पार्टी आयोजित करना शुरू किया। राष्ट्रपति भवन में पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम ने इफ्ता र पार्टी गैर जरूरी मानकर बंद कर दी थी। उन्होंने तो इस आयोजन से बचने वाले पैसे अनाथाश्रम को दान करने के निर्देश दिए थे। जाहिर है कि ये सारे आयोजन सरकारी खर्च पर ही होते आए हैं। कई मुसलमान भी इस तरह की पार्टियों को फिजूलखर्ची मानते हैं। लेकिन राष्ट्रपति भवन से जो सूचना आई है, उसके मुताबिक वहां अब कोई भी धार्मिक आयोजन नहीं होगे। इस अधिसूचना में कहा गया है कि ‘’राष्ट्रपति भवन एक सेक्युलर स्टेट का मूर्त रूप है। धर्म और गवर्नेंस अलग हैं। टैक्स चुकाने वालों की रकम पर राष्ट्रपति भवन में किसी भी धर्म से जुड़ा त्योहार नहीं मनाया जाएगा। हालांकि, राष्ट्रपति देशवासियों को हर धर्म के त्योहारों पर शुभकामनाएं देंगे। राष्ट्रपति भवन परिसर में रहने वाले किसी भी अफसर या कर्मचारी पर कोई पाबंदी नहीं होगी। वह अपने धर्म से जुड़े त्योहारों को मनाने के लिए आजाद हैं।

बात सही है कि सरकारी खर्च पर धार्मिक आयोजन क्यों हों? यही बात सेक्युलरवादी बरसो से कहते आ रहे हैं। राज्य का कोई धर्म नहीं होता। भले ही वह धर्मविरोधी न हो। यहां असल सवाल मंशा का है। सभी धर्मों के आयोजन बंद करने के पीछे सार्वजनिक बटुए की बचत है या फिर केवल ‘इफ्तारर’ को बंद करने के लिए बाकी को भी इसमें लपेट लिया गया है। ताकि कोई सवाल न उठे। लेकिन यही नियम राष्ट्रपति की धार्मिक यात्राअों और धार्मिक समागमों में जाने पर भी लागू होना चाहिए। वे यात्राएं भी सरकारी खर्च पर क्यों हो? तीसरा और असल मैसेज यह है कि मुसलमानों की मुख्यधारा में भूमिका अब हाशिए की है। वे अपने आप में सिमटे रहें। कोई दल यह संदेश नहीं देना चाहता कि उसकी सत्ता की थाली में मुस्लिम वोटों का शेयर भी है। उनके सुख- दुख, तीज- त्यौहारों से हमे क्या लेना- देना। बेशक इफ्तार पार्टियां बंद होने से जनता का पैसा बचेगा, लेकिन परस्पर विश्वास और आश्वस्ति का जो सियासी पैबंद इस सतही आयोजन के मार्फत लगता था, वह भी उधड़ जाएगा, यह तय है। जबकि ट्रंप जैसे नेता इसी इफ्तार में ‘भाई चारे’ का विस्तार देख रहे हैं।

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