किसी राष्ट्र को सशक्त बनाना हो तो सबसे पहले उसके सामाज की बुनियाद को मजबूत करना होगा. क्योंकि खोंखली नींव पर कभी गगन चुम्बी बिल्डिंग नहीं बनाई जा सकती. और जब आप एक अच्छा समाज बनाने में नाकाम हो जाते हो तब वो नाकामी सिर्फ एक सामाज कि नहीं है बल्कि पुरे राष्ट्र की है. हाल ही में कठुआ रेप ने समाज की नाकामी को एक बार फिर उजागर किया है. और यह साबित कर दिया कि हम वो समाज नहीं बन सके जिसकी हमारे बुजुर्गों ने कभी कल्पना कि थी.

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पिछले हफ्ते कई ऐसे क्षण आए जिसने इंसानियत को शर्मसार किया. इसमें 8 साल की बच्ची के साथ हुआ अपहरण और बलात्कार के मामले ने सभी को काफी डराया. जिस तरह इस घटना को सनसनीखेज बनाया गया और इस पर  राजनितिक रोटियाँ सेकी गयी तथा इसे मजहबी रंग दिया गया. देखा जाए तो यह एक ऐसी रेस थी जिसमें यह शर्त लगी थी कि कौन कितना नीचे गीर सकता है. मगर जो अब हुआ वो सारी हदों के पार था.

यह अश्लील वैबसाइट के ट्रेंडिंग पेज का स्क्रीन शोर्ट है जिस पर सबसे ऊपर आसिफा का नाम आ रहा है. 

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यह पूरी तरह अस्वीकार्य है. हम इतने नीचे गीर कर किसी से घृणा कैसे कर सकते हैं. हाँ, इस घिनोने कृत्य में हम सब शामिल है. हम ही ने जानबूझकर या अनजाने में एक ऐसे सामाज का निर्माण कर दिया है जहाँ इस तरह कि घटनाओं का होना आम है. दोस्तों के साथ चौराहे पर किसी लड़की को देख कर भद्दी टिप्पणी करना या मोबाइल से किसी के एम.एम .एस को साझा करना ऐसे कई गुनाह है जिसे करते वक्त हम उसे गुनाह नहीं मानते.

हम आज बस किसी बच्ची कि आबरू बचाने में असफल नहीं हुए, बल्कि उस गुरुर को भी चकनाचूर करने में सफल हुए जिसे हम इंसानियत कहते थे.