युवाओं के गणतंत्र को सामाजिक न्याय की तलाश : डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

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नई दिल्ली : दुनिया के  सबसे ज्यादा युवाओं से आबाद हमारे देश की आधी जनसंख्या की उम्र 30 साल से कम है ,जबकि आबादी का  65 फ़ीसदी 35 साल से कम है। प्रगति के इस युग में भारतीय प्रतिबद्दता से लोकतंत्र को सर्वागीण विकास का बेहतर माध्यम मानते है और इसीलिये दुनिया का सफलतम लोकतान्त्रिक देश भारत अब संविधान लागू होने के सातवें दशक के अंतिम छोर पर है।दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी के मानवाधिकार सुनिश्चित करने और सामाजिक न्याय हासिल करने के लिए भारतीय संरचना को बेहद मजबूत माना जाता है,मानवाधिकारों के प्रति निष्ठा भारत के संविधान के विविध प्रावधानों से स्पष्ट प्रतिबिम्बित भी होती है ,लेकिन विविधताओं वाले इस देश में राजनीतिक दलों की  लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता सवालों में रही है। विडंबना ही है की युवाओं के इस देश की नुमाइंदगी करने वाले सांसदों की औसत उम्र 55 साल है,जिसमें 70 साल से ज्यादा उम्र वाले 41 सांसद शामिल है।बहरहाल  मानवाधिकारों के मामलें में हमारी स्थिति उस विद्यार्थी की तरह है जो सैद्धांतिक अंको में तो प्रथम स्थान पाता है लेकिन व्यवहारिक मूल्यांकन में उसकी स्थिति बदतर हो जाती है।

वैश्विक युवा विकास सूचकांक में भारत की स्थिति बहुत खराब है, 183 देशों की इस सूची  में भारत 133 क्रम पर है। रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व की युवा आबादी में 20 प्रतिशत हिस्सेदार है,जिसमें 15 से 30 वर्ष तक की युवाओं की आबादी 345 मिलियन है। रोजगार,शिक्षा,स्वास्थ्य,नागरिक और राजनीतिक क्षेत्र में युवा बदहाल है ।रोजगार की तलाश में हर महीनें 10 लाख नये लोग जुड़ते है,जबकि करोड़ों बेरोजगारों को रोजगार कैसे दे इस पर कोई सफल नीति अब तक नहीं बन पाई है ।हालत ये है की उत्तराखंड में चपरासी की नौकरी के लिए जब आवेदन आये तो उसमें 85 प्रतिशत पीएच.डी.थे। सीआईआई की इंडिया स्किल रिपोर्ट-2015 के मुताबिक, भारत में हर साल सवा करोड़ शिक्षित युवा रोज़गार की तलाश में इंडस्ट्री के दरवाज़े खटखटाते हैं लेकिन उनमें से 37 प्रतिशत ही रोज़गार के काबिल होते हैं।नेशनल स्किल्ड डेवेलपमेंट कॉरपोरेशन के ताज़ा आकंड़ों में साल 2022 तक भारत को 24 विभिन्न सेक्टरों में करीब 12 करोड़ स्किल्ड लोगों की ज़रूरत होगी।हालाँकि कौशल विकास को लेकर सरकार ने मेक इन इंडिया का अभियान छेड़ा है लेकिन मंजिल से अभी कोसों दूर है।

दुनिया में 86 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार है जिसमें सबसे ज्यादा तकरीबन 21 करोड़ भारत के है।देश में 40 प्रतिशत बच्चें और 50 फ़ीसदी युवा कुपोषण के शिकार है। भुखमरी से जूझते इस देश में कुपोषण से मरने वालों की तादाद सबसे ज्यादा है ,दक्षिण एशिया में भारत अपनी जीडीपी का सबसे कम स्वास्थ्य पर खर्च करता है और गर्भावस्था में स्वास्थ्य कारणों से प्रत्येक 12 मिनट में एक महिला की मौत हो जाती  है,आर्थिक विकास में दुनिया में अग्रणी होने का दावा करने वाले इस राष्ट्र की यही हकीकत है।

  घर के दरवाजे पर स्कूल का नारा देने वाले शिक्षा के अधिकार कानून के साथ खिलवाड़ ऐसा की देश भर में लगभग एक लाख स्कूल या तो बंद किये जा चुके है या बंद होने की प्रक्रिया में है,अखिल भारत शिक्षा अधिकार से जुड़े अनिल सदगोपाल कहते है-यही सबसे दिलचस्प पहलू है,पहले मारने की सारी  तैयारी कर लीजिये और फिर कहिये कि अरे ये तो मर रहा है।सरकारी स्कूलों को पूरी रणनीति के तहत् बर्बाद किया गया,शिक्षा का स्तर गिराया गया,शिक्षकों की कमी की गयी और अब कहा जा रहा है की ये स्कूल खराब है इन्हें बंद किया जाना चाहिए।”देश के 80 फ़ीसदी बच्चें सरकारी स्कूलों से शिक्षा अर्जित करते है जहाँ उन्हें मध्यान्ह भोजन किसी वरदान से कम नही लगता।दूसरी और सामाजिक असमानता इतनी की सरकारी स्कूलों के बंद होने से करोड़ो बच्चें शिक्षा से वंचित हो जायेगे ।नतीजा बाल श्रम की स्थिति बदतर हो सकती है। 2011 की जनगणना के अनुसार 5 से 9 साल आयु के 25.33 लाख बच्चें तीन महीने से लेकर बारह महीने तक काम करते है,जबकि 1.53 लाख लाख बच्चें भीख मांगते है।

    देश में महिला आबादी 586 मिलियन अर्थात् कुल आबादी का लगभग 48.5 फ़ीसदी है लेकिन महिला सशक्तिकरण के तमाम दावों के बावजूद सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक जीवन में भेदभाव बदस्तूर जारी है ।आंकड़े बताते है की हर रोज लगभग 7000 लड़कियां भ्रूण के तौर पर ही मार दी जाती है, वहीं 6 से 10 साल की करीब 25 प्रतिशत और 10 से 13 साल की 50 प्रतिशत लड़कियां स्कूल छोड़ने को मजबूर है ।

  उदारीकरण और वैश्वीकरण के युग में विकास की इबारतें गढ़ी गयी है लेकिन उससे असमानता ही बढ़ी है।दावा यह किया  जाता है की भारतीयों की औसत संपत्ति तीन  गुना बढ़ी है,वास्तविकता यह है की अमीरों की अट्टालिकाएं ही  ऊंची हुई है, जबकि गरीबों की झोपड़ियों में इजाफा हुआ है ।.आर्थिक नीतियों को सार्थकता प्रदान की जा सकती है, लेकिन असमानता ,भ्रष्टाचार ,कॉरपोरेट मुनाफे को देखें तो उपलब्धियों की हकीकत बयान होती है।वास्तव में  वस्तूओं और सेवाओं के दम पर हासिल हुई ऊँची विकास दर की रिसन नीचे तक नही पहुंची,इसका लाभ उच्च और उच्च मध्य वर्ग तथा साधन सम्पन्न क्षेत्रों तक सीमित रहा।

देश की आधी आबादी के लिए कृषि से जुड़े क्रियाकलाप जीविकोपार्जन का प्रमुख साधन है,रोजगार में कृषि की भागीदारी कुल कार्यबल का 48.9 प्रतिशत है,लेकिन किसान बद से बदतर स्थिति में जी रहे है,कृषि लागत बढ़ने और फसलों की क्षति से भयभीत अब वे शहरों की और रोजगार के लिए पलायन कर रहे है,पिछलें बीस वर्षो से हर दिन 2052 किसान रोजगार के लिए शहरों की और जा रहे है। स्व्च्छता की चुनौती से रूबरू देश के महज  2 प्रतिशत शहरों में ही सीवेज सिस्टम ठीक है,जबकि विश्व प्रवासन की एक रपट के अनुसार भारत की शहरी जनसंख्या 2050 तक 81.4 करोड़ तक पहुँचने की संभावना है।

इन तमाम परेशानियों से जूझते युवाओं के भारत में काले धन को लेकर प्रधानमंत्री की पहल प्रशंसनीय है लेकिन आर्थिक उदारवाद ने गलत तरीके से धन अर्जित करने की एक व्यवस्था बना दी है जो संस्था बनने के बाद एक संस्कृति के रूप में विकसित हो गयी है।कल्याणकारी राज्य में शिक्षा,स्वास्थ्य,बिजली ,पानी जैसी बुनियादी आवश्यकता की चीजें निजी हाथों में जाने से भ्रष्टाचार बढ़ा है,जबकि सामाजिक न्याय की स्थिति  दूभर हुई है।

जबकि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के दावों के बीच सामाजिक न्याय की स्थापना दर असल सबसे बड़ी चुनौती है।वास्तव में भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में नीति निर्माताओं के सामने एक बड़ा सवाल यह होना चाहिए की वे अपने सीमित संसाधनों का प्रयोग किस तरह,किसके लिए ,किन मूल्यों और मान्यताओं  के लिए करे,समाज के सर्वागीण विकास के बिना प्रगति एक दिवास्वप्न ही हो सकता है।