श्राद्ध में मनाया जाता है संजा का त्यौहार

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अलग अलग नाम
गणेश उत्सव के बाद कुँवारी कन्याओं का त्योहार आता है ‘संजा’। यूँ तो यह भारत के कई भागों में मनाया जाता है। लेकिन इसका नाम अलग होता है, जैसे- महाराष्ट्र में गुलाबाई (भूलाबाई), हरियाणा में ‘सांझी धूंधा’, ब्रज में ‘सांझी’, राजस्थान में ‘सांझाफूली’ या ‘संजया’। क्वार कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से आरंभ होकर अमावस्या तक शाम ढलने के साथ घर के दालान की दीवार के कोने को ताजे गोबर से लीपकर पतली-पतली रेखाओं पर ताजे फूल की रंग-बिरंगी पंखुड़ियाँ चिपका कर संजा तैयार की जाती है।

गान
‘छोटी-सी गाड़ी गुड़कती जाए, गुड़कती जाए,
जी में बैठ्या संजा बाई, घाघरो धमकाता जाए,
चूड़लो छमकाता जाए,
बई जी की नथड़ी झोला खाए,
बताई दो वीरा पीयर जाए।’

विभिन्न आकृतियाँ
गणेश, चाँद-सूरज, देवी-देवताओं के साथ बिजौरा, कतरयो पान, दूध, दही का वाटका (कटोरी), लाडू घेवर, घुघरो नगाड़ा, पंखा, केले का झाड़, चौपड़ दीवाली झारी, बाण्या की दुकान, बाजूर, किल्लाकोट होता है। मालवा में ‘संजा’ का क्रम पाँच (पंचमी) से आरंभ होता है। पाँच पाचे या पूनम पाटला से। दूसरे दिन इन्हें मिटाकर बिजौर, तीसरे दिन घेवर, चौथे दिन चौपड़ और पंचमी को ‘पाँच कुँवारे’ बनाए जाते हैं। लोक कहावत के मुताबिक जन्म से छठे दिन विधाता किस्मत का लेखा लिखते हैं, जिसका प्रतीक है छबड़ी। सातवें दिन सात्या (स्वस्तिक) या आसमान के सितारों में सप्तऋषि, आठवे दिन ‘अठफूल’, नवें दिन ‘वृद्धातिथि’ होने से डोकरा-डोकरी और दसवें दिन वंदनवार बाँधते हैं। ग्यारहवें दिन केले का पेड़ तो बारहवें दिन मोर-मोरनी या जलेबी की जोड़ मँडती है। तेरहवें दिन शुरू होता है किलाकोट, जिसमें 12 दिन बनाई गई आकृतियों के साथ नई आकृतियों का भी समावेश होता है। संजा को गुलपती, गेंदा, गुलबास के फूलों से सजाया जाता है। संजाबाई के किलाकोट में कौआ बेहद जरूरी है, जिसे सुबह सूरज उगने के पहले संजा से हटा दिया जाता है। इसके पीछे की मान्यता है कि कौआ रात में न हटाने से वह संजा से विवाह के लिए ललक उठता है। पूजा के पश्चात कच्चा दूध, कंकू तथा कसार छाँटा जाता है। प्रसाद के रूप में ककड़ी-खोपरा बँटता है और शुरू होते हैं संजा के गीत-

‘संजा’ शब्द संध्या का ही एक लोक रूप है। कुआरी कन्याएँ इसे मंगलदायी देवी के रूप में अपने कौमार्य की सुरक्षा और मन के अनुकूल वर की प्राप्ति की इच्छा से मनाती हैं। सोलह दिन सोलह वर्षों के प्रतीक हैं। परम्परागत रूप से 16 वर्ष की आयु ही कन्या के विवाह के लिए मान्य रही है। इसी कारण कन्याएँ अपनी सखी संजा को सोलहवें दिन ससुराल के लिये विदा करती हैं। चूंकि इसे पितृपक्ष में मनाया जाता है, इसलिये इसमें पितृ देवताओं के स्वागत का भाव भी निहित है। संजा यूं तो मिट्टी की दीवार पर गोबर से लीप कर बनाया जाता है, किन्तु आजकल पक्की दीवारों पर भी काग़ज़ के बने संजा चिपकाकर ही अपनी अभिव्यक्ति की जाती है। कहीं-कहीं पर पक्के मकानों की बाहरी दीवार भी कन्याओं के इस कलाकर्म के लिये केनवास बन जाती है, जिस पर अपनी रुचि और क्षमतानुसार वे संजा मांडती हैं। संजा बहुत ही सरल, सहज और बगैर खर्च के बनने वाली विद्या है। इसमें संजा का कोई निश्चित नियत नाप नहीं होता, फिर भी लगभग तीन फुट वर्गाकार आकार को गोबर से लीप कर उस पर तिथिवार आकारों का अंकन किया जाता है। इस पर गोबर से उंगलियों द्वारा उभरे हुए आकार बनाये जाते हैं, जिनको फूलों, पत्तियों, रंगीन कांच की पन्नियों, कांच के टुकड़ों इत्यादि से सजाया जाता है। परम्परागत मान्यता के अनुसार गुलतेवड़ी के फूल सजावट के लिये उपयुक्त समझे जाते हैं। संजा की आकृति को और ज्यादा सुंदर बनाने के लिये हल्दी, कुकुंम, आटा, जौ, गेहूँ का भी प्रयोग किया जाता है। संजा सिर्फ एक परंपरा नहीं है। संजा के मांडनों तथा गीतों में महिलाओं के विवाहित जीवन से जुड़े कई जीवन सूत्र छिपे होते हैं, जिन्हें बचपन में ही कुंवारी कन्याओं के जीवन में संजा पर्व के दौरान समझने का मौका मिलता है। हालांकि बदलते समय के साथ इस परंपरा का ह्रास अवश्य हुआ है,