यात्रा संस्मरण ( प्रथम )
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अमेरिका में हमारे दल की यात्रा का उद्देश्य था व्यवस्था का अध्ययन अर्थात जो व्यवस्था में नयी बातें हैं उनका मनन करना और हमारे देश की परिस्थिति के अनुरूप , यहाँ के सन्दर्भ में विचार करना |
यात्रा का पहला पड़ाव था सिराक्यूस शहर जो न्यूयार्क से तक़रीबन 4 घंटे की सड़क मार्ग से की गयी यात्रावधि का है | इस शहर की कुल आबादी एक लाख के आसपास है | अमेरिका में इतनी आबादी के शहर भी थोड़े ही हैं , अधिकांश शहर कम आबादी के हैं पर संसाधन के लिहाज से वे अत्यधिक संपन्न हैं | इसी शहर के नाम पर विश्वविद्यालय है , जिसमे मैक्सवेल प्रबंधन स्कूल में हमें प्रशिक्षण दिया जाना था | अमेरिका में हॉवर्ड , प्रिंसटॉन , बोस्टन और सिराक्यूस समेत जितने भी विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय हैं वे सब निजी हैं , सरकारी नहीं , हाँ यह अवश्य है की वे बिना लाभ अर्जित करने वाले संस्थान हैं | मैक्सवेल स्कूल प्रबंधन का बड़ा पुराना संस्थान है और सिराक्यूस विश्वविद्यालय से सम्बद्ध भी है , इसके भारत से सम्बन्ध बड़े पुराने जो इनके परिसर में लगे विभिन्न वृत्तचित्रिण से व्यक्त हो रहे थे |
पहले सत्र का विषय था शिक्षा | हमें बताया गया की अमेरिका में कक्षा 12 तक शिक्षा सभी के लिए निःशुल्क है , निःशुल्क यानि बच्चो को स्कूल भेजने के लिए बस का पैसा भी नहीं लगता |ऐसा नहीं है की इन सब के लिए कोई अलग से चार्ज देना होता है बल्कि ये सब प्रबंध स्थानीय शासन सम्हालता है और इसका खर्चा नागरिकों से वसूले गए संपत्ति कर में से करता है | इस सब के लिए स्थानीय निकाय के अंतर्गत स्कूल प्रबंधन बोर्ड गठित होता है | शहर के विभिन्न मोहल्लों के लिए दूरी के हिसाब से स्कूल निर्धारित हैं और आपको अपने बच्चों को उसी निर्धारित स्कूल में पढ़ना होगा , यदि आप चाहते हो की किसी और लोकेलिटी में आप का बच्चा पढ़े तो आपको इसके लिए निर्धारित स्कूल से इस हेतु अनापत्ति प्रमाणपत्र लगेगा | स्कूलों में भोजन “शिक्षा” के साथ शामिल है और स्कूलों में पढाई के दौरान बच्चे में उसकी अभिरुचि के अनुरूप योग्यता विकसित करने के प्रयत्न किये जाते हैं | एक नयी बात पता लगी की बच्चो को होमवर्क न के बराबर दिया जाता है और उसे पढाई जाने वाली कॉपी किताबों को वो घर नहीं ला सकता , जो पढ़ा स्कूल में ही पढ़ा और वही अपनी अलमारी में रख दिया घर लाने का काम नहीं , हमारे भारतीय माँ- बाप तो इसी में परेशां हो जाएँ की बच्चा पढ़ क्या रहा है ? पढाई का बोझ बच्चे पर नहीं है और इसकी किताबें भी बाजार में नहीं मिलती हैं | तो ये तो थे स्कूल के हाल , अलबत्ता कालेज की पढाई अवश्य बहुत मंहगी है और कठिन भी | कठिन इसलिए की जरूरी नहीं यदि आप के पास पैसा है तो आप हॉवर्ड में एडमिशन पा ही जाओगे यदि आप योग्यता नहीं रखते तो वे आप को दाखिला देने से मना भी कर सकते हैं | लेकिन यदि आप योग्य हो तो पैसा न होने पर भी स्कालरशिप के जरिये आप पढ़ सकोगे | हमारा प्रश्न था कि यदि पैसा नहीं हैं और बच्चा बहुत एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी नहीं है तो फिर क्या होगा ? क्या मध्यम श्रेणी के लोगों के लिए कालेज की पढाई का उपाय नहीं है ? उत्तर मिला जी है न ! ऐसे लोगों के लिए कम्युनिटी कालेज हैं , जिनकी फ़ीस कम है और उसके लिए भी लोन भी उपलब्ध है बल्कि कम्युनिटी कालेज में पढ़ने वाले बच्चो में 70 प्रतिशत बच्चे स्कालरशिप या लोन से ही पढ़ रहे हैं | हमने पूछा तो इसके लिए केवल अमेरिका के बच्चों को ही सुविधा होगी ? जबाब मिला जी नहीं पूरी दुनिया के बच्चे यहाँ पढ़ सकते हैं बिना भेदभाव के और जो सारी सुविधाएँ गिनाई गयीं वे भी सबको बराबरी से हासिल हैं | हमें कम्युनिटी कालेज का भ्रमण भी कराया गया | कम्युनिटी कालेज के भ्रमण में हमने परिसर जो देखा तो लगा ये तो सर्वसुविधा संपन्न है इसके साथ ही हमने देखा “स्टूडेंट सेन्ट्रल” यानी छात्रों की जिज्ञासाओं और तकलीफों का समाधान केंद्र | आधुनिक सुविधा युक्त इस केंद्र में छात्रों के लिए अनेक व्यवस्थाओं समेत उनकी काउंसिलिंग की भी सुविधा है की वे अपने भविष्य के लिए क्या कर सकते हैं ? यहां अनेक देशों के झंडे लगे थे , पता चला कि जिस देश के भी विद्यार्थी यहाँ पढ़ रहे हैं उनके झंडे यहाँ लगे हैं , देख के अच्छा लगा कि भारत का झंडा भी यहाँ फहरा रहा था |कम्युनिटी कालेज के केम्पस भ्रमण में देखा केम्पस के बीचोंबीच “रमजान” माह की मुबारकबाद के बोर्ड भी लगे थे , कुछ आश्चर्य हुआ , 9 / 11 की घटना के बाद असहिष्णुता की कुछ दबी छिपी खबरें यदा कदा सुनने मिला करती थीं ऐसे में यहाँ मुबारकबाद के पोस्टर देखना सुखद अनुभव था |
मैक्सवेल स्कूल , सिराक्यूविश्विद्यालय और वहां के कम्युनिटी कालेज के कुछ फोटो आपकी नज़र कर रहा हूँ |
।। लेखक आनंद शर्मा है