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    •   भारत के पड़ोस से आतंकवाद खत्म करने के हमारे प्रयासों में अमेरिका के सहयोग की सराहना करता हूं: मनोहर पर्रिकर
    •   मध्य प्रदेश के छतरपुर में भारी बारिश के कारण दो मंजिला इमारत ढही। हादसे में दो लोगों की मौत, सात घायल।
    •   एनएसजी में भारत की सदस्यता के लिए अमेरिका के समर्थन की बात दोहराई।
    •   अमेरिकी रक्षा मंत्री कार्टर ने एमटीसीआर में भारत की सदस्यता का स्वागत किया।
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    •   हिमाचल प्रदेश: किन्नूर जिले के चौरा गांव में एनएच-5 पर बीती रात चट्टान गिरने से राजमार्ग बाधित।
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    •   एक दूसरे के सैन्‍य ठिकानों का इस्‍तेमाल कर सकेंगे भारत-यूएस
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संपादकीय

  • क्योंकि व्यवस्था को कभी शर्म नहीं आती

    व्यवस्था को कभी शर्म नहीं आती। आना भी नहीं चाहिए अगर आ गई तो वह व्यवस्था कैसी ? लालकिले की प्राचीर से लेकर छुटभईया नेता तक आम आदमी की बात करते हैं कहते हैं कि अंतिम आदमी तक पहुंचेंगे लेकिन छत्तीसगढ़ में अपनी ही पत्नी के शव को 12 किलोमीटर तक ढोने वाला व्यक्ति क्या आम आदमी भी नहीं था। उसकी स्थिति आम आदमी से भी गई गुजरी थी । स्मार्ट सिटी और डिजिटल इंडिया के नारों के आगे ये घटनाएं किस भारत की तस्वीर पेश करती है ? यह सोचने वाली बात है। कालाहांडी में सरकारी अस्पताल उसे इतनी भी सुविधा नहीं दे सके कि वह अपनी पत्नी का शव किसी वाहन से ले जा सके ।उड़ीसा के भुवनेश्वर में शव को ले जाने से पहले उसके हाथ पैर तोड़ दिए गए ये तमाम घटनाएं क्या साबित करती हैं? एक तरफ तो तरक्की और अच्छे दिन के नारे हैं एक तरफ अंबानी से लेकर अडानी बंधुओं की बढ़ती हुई संपत्ति के ब्यौरे हैं और दूसरी तरफ देश के आम आदमी से भी बदतर जिंदगी जीने वाले इन लोगों की सच्चाई है। आजादी के 70 साल बाद भी हम अपने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को ठीक नहीं कर पाए हैं और इस बार तो केन्द्रीय बजट में स्वास्थ्य पर खर्च होने वाली राशि भी घटा दी गई। 10 हजार करोड़ लूटकर माल्या जैसे लुटेरे विदेश भाग जाते हैं और दूसरी तरफ बेचारे आम आदमी को लाश ढोने के लिए खुद का कंधा ही मिलता है। ये किस भारत की तस्वीर है ? सोचने वाली बात है कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को सरकार ने किस बदतर स्थिति में पहुंचा दिया है ।

    निजी अस्पताल तो कसाई खानों में बदल गए हैं जहां अगर कोई व्यक्ति एक बार पहुंच जाए तो उसका सब कुछ बिकना तय है। ऐसी घटनाएं हमें चौंकाती तो है लेकिन इसकी जवाबदेही कोई नहीं लेता? यह निश्चित रूप से बेहद त्रासद है।
    -अर्जुन राठौर

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