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संपादकीय

  • रेल बजट विलय का औचित्य

    केंद्रिय मंत्री परिषद ने रेल बजट के आम बजट मे विलय प्रस्ताव को मंजूरी देकर 1924 से जारी परम्परा को समाप्त कर नई पहल की शुरूआत की है. क्या यह एक परम्परा को समाप्त कर नई परम्परा की नीव डालने का ही प्रश्न है या इसके और भी निहितार्थ है ?. तर्क दिये जा रहे है कि इस कवायद से रेल विभाग को रू 9700 करोड का लाभांश सरकार को नही चुकाना पडेगा तथा उसे लाभ पन्हुचेगा. रेल और वित्त दोनो एक ही सरकार के दो विभाग है ऐसे मे एक विभाग द्वारा दूसरे विभाग को लाभांश का भुगतान करने या न करने से सकल रूप से देश को क्या फर्क पडेगा ?. जाहिर है यह गढा गया तर्क है जो इस बजट विलय के असली एजेंडे को छुपाने के लिए प्रस्तुत किया गया है. यह प्रस्ताव रेल, सडक, विमानन और जहाजरानी विभाग को मिलाकर परिवहन विभाग बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है जिसकी अगली कडी निवेशको के लिए एक नीति, परिवहन सबसिडी की समाप्ति, किराए मे एकरूपता की होगी. स्वाभाविक रूप से निवेशको को इससे लाभ होगा तथा जनता के यात्रा व्यय मे बढौती होगी.

    भारतीय रेल देश की आत्मा है, एक लघु भारत को हम प्रतिदिन ढाई करोड यात्रियो के तौर पर रेल मे यात्रा करते देखते है. पृथक रेल बजट से इस सहज, सुगम, सुलभ परिवहन सेवा के लिए सरकारे चाहे-अनचाहे जन दबाव को महसूस करती थी तथा जनता पर बोझ डालने के पूर्व गम्भीरता से विचार करती थी. रेल बजट के निमित्त रेल सेवा के सुधार, विस्तार, उन्नयन व यात्री सुरक्षा के मुद्दो पर लोकसभा व राज्य सभा मे विमर्श होता था तथा जन हितैषी निर्णय के लिए सरकारो पर दबाव बनाया जाता था . देश भर मे अर्थशास्त्री, विचारक, सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता गोष्ठियो, चर्चाओ व प्रतिक्रियाओ के माध्याम से विभिन्न आयामो से अपना पक्ष रखते थे तथा रेल विभाग को जनता की उम्मीदो, आशाओ व अपेक्षाओ के साथ अपनी कमजोरियो को जानने का अवसर प्राप्त होता था. सामान्य बजट मे रेल बजट के विलय से यह पक्ष धुंधला जाएगा.

    आज लोक कल्याण का विचार सरकार के स्तर पर लगातार छीजता जा रहा है तथा योजना आयोग को नीति आयोग, अपंग को दिव्यांग, निर्मल भारत को स्वच्छ भारत, रेसकोर्स रोड को लोककल्याण मार्ग जैसे नाम परिवर्तन तक सीमित रह गया है. यह प्रस्ताव निजी क्षेत्र को बढावा , प्रोत्साहित व लाभ पन्हुचाने के छीपे एजेंडे का हिस्सा ही है.

    इसी तरह पूर्व मे डाक विभाग के बजट को समाप्त किया गया था और हमे याद है पोस्ट कार्ड, मनीआर्डर व अंतर्देशीय पत्र जैसे जनोपयोगी माध्यमो की दर वृद्धि मे सरकारे संकोच व झिझक महसूस करती थी. सूचना व संचार क्रांति ने डाक विभाग की आवश्यकता भले ही घटाई हो परंतु उसके समानांतर बढावा दी गई निजी कोरियर सेवाओ के भार वहन को हम सब विवश है तथा उसके खिलाफ कन्ही आवाज नही उठाई जा सकती है.

    रेल बजट विलय का यह प्रस्ताव दबे-छुपे रेल के निजीकरण के प्रयासो के तीव्र करने तथा आमजन को सहज, सुगम, सुलभ व सस्ती परिवहन सुविधा से विमुख करेगा. भारतीय रेल का सार्वजनिक स्वरूप बना रहे, रेल को लाभ-हानी के गणित से परे जनोपयोगी सुविधा बनाए रखने के लिए इस प्रस्ताव को अविलम्ब वापस लेने के लिए जनदबाव बनाना चाहिए.

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